नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आवश्यक कैंसर दवा की कीमत में 10 गुना अंतर पर सवाल उठाए। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ दवा मूल्य निर्धारण और जेनेरिक दवाओं के नियमन संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने कहा कि निर्माता खुदरा विक्रेताओं को 2700 रुपये में दवा बेचता है जो बाजार में 27000 रुपये में बिकती है। यह खुलेआम दिनदहाड़े डकैती है और मरीजों के साथ पूर्ण लूटपाट है। अदालत ने मरीजों पर पड़ने वाले बोझ पर चिंता जताई जिन्हें इलाज के लिए घर और जेवर तक बेचने पड़ते हैं। मरीजों को आवश्यक दवा के लिए इस तरह ठगे जाने पर अदालत ने आश्चर्य व्यक्त किया।
अधिकारियों से जवाब तलब
खंडपीठ ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण यानी एनपीपीए और फार्मास्यूटिकल्स विभाग से पूछा कि इस पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई। अदालत ने कहा कि आश्चर्य है कि इस पर फैसला लेने वाले अधिकारी पूरी तरह चुप हैं। अगर यह वसूली नहीं तो और क्या है। खुदरा विक्रेताओं को एमआरपी के 10 प्रतिशत पर दवा मिलती है फिर यह अंतर क्यों है यही हम पूछ रहे हैं। याचिकाएं अधिवक्ता किशन चंद जैन और डॉक्टर संजय कुलश्रेष्ठ द्वारा दायर की गई हैं जिनमें दवाओं, उपकरणों और जेनेरिक दवाओं के मूल्यों को आम नागरिकों के लिए किफायती बनाने हेतु अदालत के हस्तक्षेप की मांग की गई है। नियामक संस्थाओं की चुप्पी पर अदालत ने गहरी चिंता जताई।
मरीजों पर आर्थिक बोझ
अदालत ने चिंता जताई कि आवश्यक कैंसर दवा के लिए मरीजों को कैसे धोखा दिया जा सकता है। इलाज के भारी खर्च के कारण कई परिवार घर और आभूषण तक बेचने को मजबूर हो जाते हैं। 10 गुना कीमत का अंतर मरीजों के लिए असहनीय बोझ बन जाता है। अदालत ने इसे मरीजों के साथ rampage और carnage बताया। आवश्यक दवाओं में ऐसे अंतर को लेकर नियामक संस्थाओं की निष्क्रियता पर सवाल उठाना अदालत का मुख्य फोकस रहा। गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए यह स्थिति और भी पीड़ादायक है। स्वास्थ्य सेवा की पहुंच और सामर्थ्य पर यह मुद्दा सीधे असर डालता है।
केंद्र का रुख और अगली सुनवाई
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि सरकार इन कार्यवाहियों को विरोधी नहीं मानती। मौजूदा तंत्र पर 29 सितंबर को अगली सुनवाई में अपना पक्ष रखेगी। अदालत ने मूल्य निर्धारण और नियमन संबंधी मुद्दों पर विस्तार से सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के मूल्यों को नियंत्रित कर आम लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवा सुलभ बनाई जाए। अगली तारीख पर सरकार के विस्तृत जवाब का इंतजार है। अदालत इस मामले को गंभीरता से ले रही है और आगे की कार्यवाही तय करेगी।
व्यापक संदर्भ और महत्व
यह मामला दवा मूल्य निर्धारण और जेनेरिक दवाओं के नियमन से जुड़ी व्यापक चिंताओं को दर्शाता है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की दवा में इतना बड़ा अंतर मरीजों के अधिकारों और स्वास्थ्य सेवा की पहुंच पर सवाल खड़े करता है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां नियामक एजेंसियों की जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। 29 सितंबर की सुनवाई में आगे की स्पष्टता आने की उम्मीद है। आवश्यक दवाओं की किफायती उपलब्धता सुनिश्चित करना जनहित से जुड़ा मुद्दा है और अदालत इस पर नजर रखे हुए है।