बच्चों की सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल मंचों तक बढ़ती पहुंच ने उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर कानूनी और सामाजिक चिंताएं खड़ी की हैं। इसी पृष्ठभूमि में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस की ओर से दायर आवेदन में बच्चों को डिजिटल मंचों पर मिलने वाली सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से बाल यौन शोषण और उससे जुड़ी सामग्री के प्रसार, उसकी सूचना देने की प्रक्रिया तथा डिजिटल मंचों की जवाबदेही को लेकर सवाल उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा कानून एवं न्याय मंत्रालय को नोटिस जारी किया और मामले में जवाब मांगा है।
क्या 18 साल से कम उम्र वालों पर लगेगा पूरा प्रतिबंध?
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इंस्टाग्राम, फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया मंचों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश नहीं दिया है। उपलब्ध न्यायिक आदेश के अनुसार, मौजूदा कार्यवाही का केंद्र सोशल मीडिया मध्यस्थों द्वारा बाल यौन शोषण सामग्री से संबंधित वैधानिक दायित्वों का पालन और उसकी अनिवार्य सूचना देने की व्यवस्था है। इसलिए इसे अभी 18 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर अदालत की ओर से लगाई गई रोक के रूप में देखना सही नहीं होगा। आयु सीमा और अभिभावकीय सहमति से जुड़े व्यापक सुझाव याचिका में उठाए गए मुद्दों का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन इस चरण पर अदालत की ओर से ऐसा कोई अंतिम प्रतिबंध घोषित नहीं किया गया है।
याचिका में अभिभावकीय सहमति की मांग क्यों?
बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर याचिका में यह तर्क दिया गया है कि नाबालिगों को डिजिटल सेवाओं तक पहुंच देते समय माता-पिता या कानूनी अभिभावक की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए। इस तरह की व्यवस्था में अभिभावक की पहचान और सहमति के सत्यापन की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। याचिका से जुड़े व्यापक तर्कों में यह चिंता सामने आती है कि बच्चों की स्वतंत्र डिजिटल पहुंच उन्हें ऑनलाइन शोषण, अनुचित संपर्क, निजी जानकारी के दुरुपयोग, साइबर उत्पीड़न और आयु के अनुरूप न होने वाली सामग्री जैसे जोखिमों के सामने ला सकती है। इसी वजह से बच्चों के लिए डिजिटल मंचों की जवाबदेही और सुरक्षा उपायों को केवल आयु सीमा तक सीमित रखने के बजाय व्यापक सुरक्षा ढांचे के रूप में देखने की मांग की जा रही है।
सोशल मीडिया कंपनियों की कानूनी जिम्मेदारी पर अदालत सख्त
सुप्रीम कोर्ट ने इसी मामले में पहले 23 सितंबर 2024 को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए बाल यौन शोषण सामग्री से संबंधित मामलों में सोशल मीडिया मध्यस्थों की जिम्मेदारियों को स्पष्ट किया था। अदालत ने कहा था कि सूचना प्रौद्योगिकी कानून और लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम के तहत निर्धारित दायित्वों का पालन जरूरी है। 2026 की नई कार्यवाही में याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कुछ डिजिटल मंच बाल यौन शोषण सामग्री की पहचान और उससे संबंधित अनिवार्य सूचना देने की व्यवस्था का पूरी तरह पालन नहीं कर रहे हैं। अदालत ने इन गंभीर चिंताओं को देखते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।
बाल यौन शोषण सामग्री की सूचना देने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट के 14 अगस्त 2026 के आदेश में विशेष रूप से बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़े मामलों की सूचना भारतीय कानून के तहत संबंधित पुलिस अधिकारियों को देने की जिम्मेदारी पर जोर दिया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी विदेशी संस्था को सूचना देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता, बल्कि कानून में जिन भारतीय अधिकारियों को सूचना देना अनिवार्य किया गया है, उनका भी पालन करना होगा। अदालत ने यह भी कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत मिलने वाली सुरक्षित कानूनी स्थिति का लाभ उठाने के लिए मध्यस्थों को संबंधित कानूनी दायित्वों का पालन करना होगा। इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा गया है और अगली सुनवाई के लिए 24 सितंबर 2026 की तारीख तय की गई है।
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा बनी बड़ी चुनौती
इंटरनेट और सोशल मीडिया के तेजी से विस्तार ने बच्चों के लिए शिक्षा, संवाद और मनोरंजन के नए अवसर खोले हैं, लेकिन इसके साथ डिजिटल जोखिम भी बढ़े हैं। बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों से जुड़ी जानकारी का संग्रह, व्यवहार आधारित प्रोफाइलिंग, साइबर उत्पीड़न और अनुचित सामग्री तक पहुंच जैसी चिंताएं अभिभावकों तथा नीति निर्माताओं के सामने लगातार बनी हुई हैं। विशेष रूप से बाल यौन शोषण सामग्री का प्रसार गंभीर आपराधिक और सामाजिक चुनौती है। इसी कारण न्यायपालिका अब डिजिटल मंचों की जिम्मेदारी, कानून के पालन और बच्चों की सुरक्षा के बीच संतुलन पर अधिक स्पष्टता चाहती दिखाई दे रही है। यह बहस केवल सोशल मीडिया की आयु सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार करने से जुड़ी व्यापक चुनौती है।
आगे क्या हो सकता है?
अब केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इस मामले में अपना पक्ष रखना है। अदालत के आदेश के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय को नोटिस जारी किया गया है और मामले को 24 सितंबर 2026 को आगे सुना जाना है। आगे की सुनवाई में सोशल मीडिया मध्यस्थों की जवाबदेही, बाल यौन शोषण सामग्री की सूचना देने की प्रक्रिया और मौजूदा कानूनी सुरक्षा व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन पर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश सामने आ सकते हैं। यदि सरकार या अदालत बच्चों की आयु सत्यापन, अभिभावकीय सहमति अथवा डिजिटल मंचों की अतिरिक्त जवाबदेही से संबंधित कोई व्यवस्था आगे बढ़ाती है, तो उसका असर भारत में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल के नियमों पर पड़ सकता है। फिलहाल 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध को अदालत का मौजूदा आदेश मानना सही नहीं होगा।