नई दिल्ली: एमबीबीएस (MBBS), स्नातकोत्तर (PG) और सुपर स्पेशियलिटी मेडिकल कोर्स पूरा करने के बाद डॉक्टरों के लिए अनिवार्य ग्रामीण सेवा (Compulsory Rural Service) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने शुक्रवार को कहा कि राज्यों में अलग-अलग नियमों के बजाय पूरे देश के लिए एक राष्ट्रीय समान नीति (Uniform National Policy) बनाई जानी चाहिए। अदालत ने केंद्र सरकार को इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की सलाह दी है और सॉलिसिटर जनरल के अनुरोध पर सरकार का रुख स्पष्ट करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है।
कर्नाटक के नियम को सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती
यह पूरा विवाद कर्नाटक सरकार के एक कानून (Karnataka Compulsory Service Training by Candidates Completed Medical Courses Act, 2012) और उसके नियमों से शुरू हुआ। इसके तहत सरकारी और निजी/डीम्ड विश्वविद्यालयों के सरकारी कोटा सीटों के मेडिकल छात्रों को स्थायी पंजीकरण (Registration) से पहले एक वर्ष की अनिवार्य सरकारी ग्रामीण सेवा देनी होती है।विवाद तब और बढ़ा जब 28 जुलाई 2023 की एक अधिसूचना के माध्यम से इस नियम को निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों की 'प्राइवेट सीटों' पर पढ़ने वाले छात्रों के लिए भी लागू कर दिया गया। कुछ छात्रों ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि भारी फीस देकर निजी सीटों पर पढ़ने वाले छात्रों और सरकारी सीटों पर पढ़ने वाले छात्रों के बीच अंतर है, इसलिए उन्हें इस शर्त के बिना स्थायी पंजीकरण की अनुमति दी जानी चाहिए।
'देश निर्माण में मेडिकल छात्रों की भी जिम्मेदारी'
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने कहा कि मेडिकल शिक्षा राष्ट्र के संसाधनों और बुनियादी ढांचे से जुड़ी होती है। चिकित्सकीय ज्ञान समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संपत्ति है, इसलिए प्रशिक्षित डॉक्टरों को जनहित में इस्तेमाल करना नीति निर्माण का अहम हिस्सा है। पीठ ने सवाल उठाया कि निजी मेडिकल कॉलेजों के छात्रों को ग्रामीण सेवा से पूरी तरह छूट क्यों मिलनी चाहिए।
केंद्र सरकार से तीन हफ्ते में मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल डॉक्टरों के लिए अखिल भारतीय स्तर पर अनिवार्य ग्रामीण सेवा का सीधा आदेश जारी नहीं किया है, बल्कि केंद्र सरकार से एक समान नीति बनाने की आवश्यकता पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है। अदालत अब तीन सप्ताह बाद इस मामले पर अगली सुनवाई करेगी। यदि केंद्र सरकार देशव्यापी नीति बनाती है, तो भविष्य में मेडिकल पास करने वाले डॉक्टरों के ग्रामीण सेवा नियमों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।