नई दिल्ली. भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्यतः जून के पहले सप्ताह से सक्रिय होकर अधिकांश हिस्सों में अच्छी वर्षा लेकर आता है, लेकिन इस वर्ष स्थिति अपेक्षा से काफी भिन्न रही। उपलब्ध मौसमीय आंकड़ों के अनुसार जून महीने में पूरे देश में लगभग 99.5 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जबकि दीर्घकालिक सामान्य औसत लगभग 165 मिलीमीटर है। इस प्रकार वर्ष 2026 का जून पिछले 125 वर्षों में पांचवां सबसे शुष्क जून बन गया है। सामान्य से काफी कम वर्षा के कारण अनेक राज्यों में बुआई प्रभावित हुई है, जलाशयों का जलस्तर अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पाया है और किसानों के साथ-साथ नीति निर्माताओं की चिंता भी बढ़ गई है।
आखिर क्यों कमजोर पड़ गया इस बार का मानसून?
विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष मानसून के कमजोर रहने के पीछे कई परस्पर जुड़े मौसमीय और समुद्री कारण जिम्मेदार हैं। सामान्यतः अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर आने वाली मानसूनी हवाएं पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में वर्षा कराती हैं, लेकिन इस बार इन हवाओं की तीव्रता अपेक्षाकृत कमजोर रही। समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य परिवर्तन, ऊपरी वायुमंडल में जेट स्ट्रीम की स्थिति, उच्च वायुदाब क्षेत्रों की सक्रियता तथा स्थानीय तापमान और भूमि की नमी में बदलाव ने मिलकर मानसून की गति और वर्षा वितरण को प्रभावित किया। परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में बादलों का पर्याप्त विकास नहीं हो सका और वर्षा सामान्य से काफी कम रही।
जुलाई में कम वर्षा की आशंका ने बढ़ाई कृषि और अर्थव्यवस्था की चिंता
जुलाई का महीना भारतीय कृषि के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसी अवधि में धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, अरहर सहित अनेक खरीफ फसलों की बुआई और प्रारंभिक वृद्धि होती है। यदि इस दौरान पर्याप्त वर्षा नहीं होती तो फसल उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। मौसम वैज्ञानिकों ने संकेत दिए हैं कि जुलाई में भी दीर्घकालिक औसत से कम वर्षा होने की संभावना बनी हुई है। हालांकि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने यह भी कहा है कि आने वाले दिनों में देश के कुछ हिस्सों में अच्छी वर्षा हो सकती है, लेकिन यदि वर्षा का वितरण असमान रहा तो अनेक कृषि क्षेत्रों में सिंचाई संकट गहरा सकता है। इसका प्रभाव खाद्यान्न उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य महंगाई तक देखने को मिल सकता है।
एल नीनो, भारतीय महासागर और वैश्विक मौसमीय प्रणालियों का बड़ा प्रभाव
वैश्विक मौसमीय घटनाओं का भारतीय मानसून पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों के अनुसार प्रशांत महासागर में विकसित होने वाली El Niño स्थिति समुद्र के तापमान को प्रभावित करती है, जिससे विश्वभर के मौसमीय चक्रों में परिवर्तन आता है। प्रायः एल नीनो की सक्रियता भारत में सामान्य से कम वर्षा की स्थिति उत्पन्न कर सकती है। इसी प्रकार भारतीय महासागर द्विध्रुवीयता अर्थात Indian Ocean Dipole (IOD) भी मानसून की तीव्रता और वर्षा वितरण को प्रभावित करती है। जब समुद्र के विभिन्न भागों का तापमान असंतुलित हो जाता है तो नमी का प्रवाह और बादलों का निर्माण प्रभावित होता है। यदि एल नीनो और आईओडी दोनों का प्रभाव एक साथ सक्रिय हो जाए तो मानसून की अनिश्चितता और अधिक बढ़ सकती है।
एमजेओ, समुद्री तापमान और जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई मौसम की अनिश्चितता
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि Madden–Julian Oscillation (MJO) जैसी अल्पकालिक वैश्विक वायुमंडलीय प्रणाली भी वर्षा की मात्रा को प्रभावित करती है। जब एमजेओ सक्रिय अवस्था में होता है तो वर्षा की संभावना बढ़ जाती है, जबकि इसके कमजोर पड़ने पर सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसके अतिरिक्त समुद्री सतह के तापमान में असामान्य परिवर्तन, लंबे समय तक बने रहने वाले उच्च वायुदाब क्षेत्र, पश्चिमी विक्षोभों की गतिविधि तथा हिमालयी क्षेत्र की परिस्थितियां भी मानसून के व्यवहार को प्रभावित करती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण इन सभी मौसमीय प्रणालियों की प्रकृति पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित होती जा रही है, जिससे कभी अत्यधिक वर्षा तो कभी लंबा सूखा देखने को मिल रहा है।
कमजोर मानसून का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा
यदि जुलाई और उसके बाद भी वर्षा सामान्य से कम रहती है तो इसका प्रभाव केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। जलाशयों में पानी की उपलब्धता घटने से पेयजल संकट, जलविद्युत उत्पादन में कमी और सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। खाद्यान्न उत्पादन घटने पर दालों, अनाज, तिलहनों तथा सब्जियों की कीमतों में वृद्धि की आशंका भी बढ़ सकती है। आवश्यकता पड़ने पर कुछ कृषि उत्पादों के आयात की स्थिति भी बन सकती है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि कमजोर मानसून का सीधा प्रभाव ग्रामीण आय, उपभोक्ता मांग और महंगाई दर पर पड़ सकता है। इसलिए आने वाले कुछ सप्ताह न केवल किसानों बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होंगे। मौसम वैज्ञानिक लगातार बदलती परिस्थितियों पर निगरानी रखे हुए हैं और आने वाले दिनों के पूर्वानुमानों के आधार पर स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।