जगन्नाथ मंदिर देश के चार प्रमुख धामों में से एक माना जाता है। यहां भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को निकलने वाली विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा में लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं और भगवान के रथ की रस्सी खींचकर पुण्य प्राप्त करने की कामना करते हैं।
रथयात्रा का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की रथयात्रा में शामिल होकर रथ की रस्सी खींचने से व्यक्ति के जाने-अनजाने में हुए पापों का क्षय होता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। इसी कारण हर साल देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होने पुरी पहुंचते हैं।
प्रसाद में ‘बेंत’ देने की अनोखी परंपरा
जगन्नाथ पुरी मंदिर की सबसे अनोखी परंपराओं में से एक है श्रद्धालुओं को 'बेंत' का स्पर्श कराना। मान्यता के अनुसार, मंदिर के पुजारी भगवान जगन्नाथ के पास रखी विशेष बेंत से श्रद्धालुओं को हल्के से स्पर्श करते हैं। इसे भगवान का विशेष प्रसाद माना जाता है।
श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप से जुड़ी है मान्यता
लोक मान्यताओं के अनुसार यह परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के बालपन से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि बाल कृष्ण अत्यंत नटखट थे और माता यशोदा उन्हें शरारत करने पर कभी-कभी बेंत से अनुशासित करती थीं। इसी स्मृति में बेंत को भगवान जगन्नाथ का प्रिय प्रतीक माना जाता है और मंदिर में इसे विशेष स्थान दिया गया है।
क्या है बेंत का धार्मिक महत्व?
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि जिस व्यक्ति को यह बेंत स्पर्श करती है, उसके जीवन के पापों का नाश होता है, कष्ट कम होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह बेंत नारियल की लकड़ी से तैयार की जाती है और इसे भगवान जगन्नाथ के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।
घर में भी रखी जाती है यह पवित्र बेंत
कई श्रद्धालु पुरी से इस बेंत को अपने साथ घर भी लाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि घर के मंदिर में इसे स्थापित कर पूजा करने और परिवार के सदस्यों को इसका स्पर्श कराने से सुख-समृद्धि, सकारात्मकता और शुभ फल की प्राप्ति होती है।