दीपावली दो शब्दों से मिलकर बना है जिसमें दीप का अर्थ है दीपक और आवली का अर्थ है पंक्ति या श्रृंखला। इस प्रकार यह रोशनी का पर्व कहलाता है जो अंधकार पर प्रकाश ज्ञान पर अज्ञान और भक्ति पर विस्मृति की विजय का प्रतीक है। बाहरी दीप जलाने के साथ ही यह पर्व हमें अपने भीतर के अंधकार को मिटाने की प्रेरणा देता है। जब हृदय में ईश्वर का प्रकाश नहीं होता तो भय चिंता अवसाद और मोह का अंधकार घर कर लेता है। दीपावली हमें याद दिलाती है कि सच्ची रोशनी वही है जो अंतर्मन को प्रकाशित करे और जीवन को स्थिरता प्रदान करे। इस पर्व का असली उद्देश्य बाहरी चमक से आगे बढ़कर आंतरिक ज्योति को जगाना है।
राम के अयोध्या लौटने का पावन प्रसंग
परंपरागत रूप से दीपावली भगवान राम के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की खुशी का प्रतीक है। अयोध्यावासियों ने अपने प्रिय प्रभु के आगमन पर पूरे नगर को दीपों से सजाया था। लंबे वियोग के बाद राम का घर वापस आना भक्तों के लिए आनंद का क्षण था। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन में ईश्वर की उपस्थिति न हो तो सब कुछ खोखला लगता है। राम का अयोध्या आगमन वास्तव में प्रभु को अपने हृदय में पुनः बसाने का प्रतीक है। जब हम बाहरी दीप जलाते हैं तो हमें अपने अंतर्मन की स्थिति पर भी विचार करना चाहिए कि क्या वहां प्रभु के लिए स्थान तैयार है।
भीतर के अंधकार को मिटाने की जरूरत
आजकल अधिकांश लोग भौतिक महत्वाकांक्षाओं और क्षणिक सुखों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हृदय का दीप बुझ सा जाता है। भय अवसाद चिंता और भ्रम का अंधकार जीवन को अस्थिर कर देता है। भगवद गीता में कृष्ण कहते हैं कि वे अपने भक्तों के लिए ज्ञान के प्रकाशमान दीपक से अज्ञान के अंधकार को स्वयं नष्ट कर देते हैं। जब हृदय में दिव्य ज्ञान और भक्ति का प्रकाश भर जाता है तो जीवन की सबसे बड़ी चुनौतियों के बीच भी मन अडिग रहता है। दीपावली हमें यही अवसर देती है कि हम बाहरी रोशनी के साथ भीतर की ज्योति भी जगाएं। सच्ची दीपावली तभी सफल होती है जब हृदय का अंधकार मिट जाए।
दामोदर लीला का प्रेमपूर्ण संदेश
दीपावली से जुड़ी एक और पावन लीला है दामोदर लीला जिसमें माता यशोदा कृष्ण को मक्खन खिला रही थीं। दूध उफनने के कारण वे कृष्ण को छोड़कर रसोई में चली गईं। उपेक्षा महसूस कर कृष्ण ने मक्खन का बर्तन तोड़ दिया और ओखली पर चढ़कर मक्खन खाने लगे। यशोदा ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की और सजा के रूप में ओखली से बांधने का निश्चय किया। लेकिन जितनी रस्सियां जोड़ती गईं वे हमेशा दो अंगुल छोटी पड़ती रहीं। अंत में जब यशोदा पूरी तरह थक गईं तो कृष्ण ने स्वयं को बांधने दिया। यह लीला भक्ति और कृपा के गहन रहस्य को
उजागर करती है।
दो अंगुल की कमी का आध्यात्मिक रहस्य
दामोदर लीला में रस्सी का हमेशा दो अंगुल छोटा रहना बहुत गहन अर्थ रखता है। ये दो अंगुल हमारे पुरुषार्थ और प्रभु की कृपा के प्रतीक हैं। बिना सच्चे प्रयास के दिव्य कृपा आकर्षित नहीं होती और बिना प्रभु की कृपा के हमारे सारे प्रयास अधूरे रह जाते हैं। दोनों का संयोग ही पूर्णता प्रदान करता है। जब हम निष्ठापूर्वक प्रभु को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं और उनकी करुणा पर निर्भर रहते हैं तो वे हमारे प्रेम में बंध जाते हैं। दीपावली के अवसर पर यह लीला हमें याद दिलाती है कि सच्ची भक्ति में प्रयास और कृपा दोनों अनिवार्य हैं।
हृदय में प्रभु को बसाने का वास्तविक उत्सव
अयोध्यावासियों की तरह हमें भी अपने हृदय में प्रभु के आगमन की उत्कट लालसा रखनी चाहिए। उन्हें देखने सेवा करने और प्रसन्न करने की इच्छा ही दीपावली का वास्तविक सार है। बाहरी दीप और सजावट तब सार्थक होती है जब भीतर भक्ति का दीप जलता रहे। इस पर्व पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने हृदय को प्रभु के निवास के योग्य बनाएं। जब भक्ति का प्रकाश भीतर जगता है तो जीवन की सारी दिशाएं प्रकाशित हो जाती हैं। दीपावली तभी पूर्ण होती है जब हम प्रभु को अपने अंतर्मन में स्थायी रूप से आमंत्रित कर लेते हैं।