कोलकाता: ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर सोमवार को भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा का पारंपरिक महास्नान विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न हुआ। देव स्नान पूर्णिमा, जिसे स्नान यात्रा भी कहा जाता है, जगन्नाथ संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों में से एक है। इसी अनुष्ठान के साथ विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा महापर्व की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है।
108 पवित्र कलशों के जल से हुआ दिव्य अभिषेक
मंदिर की परंपरा के अनुसार तीनों विग्रहों को विशेष शोभायात्रा के साथ गर्भगृह से स्नान मंडप तक लाया गया। इसके बाद 108 पवित्र कलशों के जल से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन चक्र का अभिषेक किया गया। जल में चंदन, पुष्प, कपूर, केसर और अन्य सुगंधित द्रव्यों को मिलाकर वैदिक मंत्रों के साथ महास्नान कराया गया। श्रद्धालुओं के लिए यह अनुष्ठान अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना जाता है।
महास्नान के बाद होते हैं गज वेश के दर्शन
महास्नान के उपरांत भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को विशेष गज वेश (हाथी स्वरूप) में सजाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह श्रृंगार भगवान गणेश के स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। इस दिव्य वेश के दर्शन के लिए देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं और इसे विशेष आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर मानते हैं।
अनसार काल में विश्राम करेंगे भगवान
सनातन परंपरा के अनुसार महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ अस्वस्थ हो जाते हैं और 'अनसार' काल के दौरान विश्राम करते हैं। इस अवधि में मंदिर के पट आम श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं और भगवान को आयुर्वेदिक औषधियों का भोग लगाया जाता है। इसके बाद नवयौवन दर्शन के साथ भगवान पुनः भक्तों को दर्शन देते हैं।
रथयात्रा से पहले आस्था का सबसे बड़ा पर्व
देव स्नान पूर्णिमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भगवान जगन्नाथ और उनके भक्तों के बीच अटूट आस्था और सनातन परंपरा का प्रतीक है। महास्नान के साथ ही पुरी में रथयात्रा की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच जाती हैं और लाखों श्रद्धालु भगवान के भव्य नगर भ्रमण का इंतजार करते हैं।