कोलकाता डेस्क: भारतीय संस्कृति में माता-पिता और पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की परंपरा सदियों पुरानी है। सनातन धार्मिक परंपरा में पितृपक्ष को इसी भावना से जुड़ी विशेष अवधि माना जाता है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और परिवार के अन्य पूर्वजों को याद करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष में तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान-पुण्य जैसे कर्म किए जाते हैं। इन अनुष्ठानों के जरिए लोग अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करते हैं।
माता-पिता को माना गया है जीवन का आधार
भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में माता-पिता को संतान के जीवन में बेहद महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। धार्मिक कथाओं में भी माता-पिता के प्रति सम्मान और उनके महत्व को विशेष रूप से बताया गया है। भगवान गणेश से जुड़ी प्रसिद्ध कथा में माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की परिक्रमा को पूरे संसार की परिक्रमा के समान माना गया है। इस कथा के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि संतान के लिए माता-पिता का स्थान सर्वोच्च होता है। इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए परिवार और समाज में अपने पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा विकसित हुई। पितृपक्ष को इसी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इस दौरान परिवार के लोग अपने पूर्वजों की स्मृतियों को याद करते हैं और धार्मिक विधि-विधान के साथ उनके लिए कर्मकांड करते हैं।
26 सितंबर से शुरू होगा पितृपक्ष
इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर 2026 से होगी और यह अवधि 10 अक्टूबर 2026 तक चलेगी। धार्मिक पंचांग के अनुसार पितृपक्ष के दौरान अलग-अलग तिथियों पर पूर्वजों के लिए श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। परिवार अपने दिवंगत सदस्यों की मृत्यु तिथि के अनुसार संबंधित तिथि पर श्राद्ध और तर्पण करते हैं। पितृपक्ष के दौरान कई लोग पवित्र नदियों, तालाबों या अन्य धार्मिक स्थलों पर जाकर भी तर्पण और पिंडदान करते हैं। हालांकि इन अनुष्ठानों की विधि और परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकती हैं।
तर्पण और श्राद्ध का बताया गया विशेष महत्व
पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध को प्रमुख धार्मिक कर्मों में शामिल किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार तर्पण के माध्यम से पूर्वजों का स्मरण करते हुए उन्हें जल अर्पित किया जाता है। वहीं श्राद्ध कर्म में परिवार की परंपरा और स्थानीय रीति-रिवाज के अनुसार अलग-अलग विधियां अपनाई जाती हैं। पुरोहित घनश्याम झा के अनुसार धार्मिक ग्रंथों में श्राद्ध कर्म के माध्यम से पितरों को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की मान्यता बताई गई है। उन्होंने गरुड़ पुराण में वर्णित मान्यताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि श्राद्ध कर्म से संतुष्ट होकर पितर आयु, संतान, यश, कीर्ति, बल, धन और धान्य की वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। हालांकि ये धार्मिक मान्यताएं हैं और इनका पालन श्रद्धा तथा पारिवारिक परंपराओं के आधार पर किया जाता है। पितृपक्ष का मूल उद्देश्य पूर्वजों को याद करना और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना माना जाता है।
दान-पुण्य की भी है परंपरा
पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध और तर्पण के साथ दान-पुण्य करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र, अन्न और अन्य उपयोगी सामग्री दान करना पुण्यदायक माना जाता है। कई परिवार अपने पूर्वजों की स्मृति में ब्राह्मण भोज, अन्नदान और अन्य धार्मिक गतिविधियों का आयोजन करते हैं। कुछ परिवार जरूरतमंद लोगों को भोजन कराते हैं और अपनी क्षमता के अनुसार दान करते हैं। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में दान-पुण्य तथा श्राद्ध से जुड़ी परंपराओं में अंतर भी देखने को मिलता है।
16 दिनों तक अलग-अलग तिथियों पर श्राद्ध
पितृपक्ष की अवधि में अलग-अलग तिथियों के अनुसार श्राद्ध कर्म किए जाने की परंपरा है। जिन पूर्वजों की मृत्यु की तिथि परिवार को ज्ञात होती है, उनके लिए उसी तिथि पर श्राद्ध किया जाता है। परिवार के लोग इस दिन अपने पूर्वजों को याद करते हुए तर्पण और अन्य धार्मिक कर्म करते हैं। वहीं सर्वपितृ अमावस्या को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दिन उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध किसी कारण से निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया हो। इस वजह से पितृपक्ष के अंतिम चरण में सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है।
पितृ दोष को लेकर क्या है धार्मिक मान्यता?
हिंदू धार्मिक परंपरा में पितृ दोष से जुड़ी मान्यताएं भी प्रचलित हैं। पुरोहित सरोज झा के अनुसार धार्मिक विश्वास में पूर्वजों के लिए उचित कर्म नहीं किए जाने को परिवार में आने वाली कुछ बाधाओं से जोड़कर देखा जाता है। इसी कारण पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य करने की परंपरा बताई जाती है। हालांकि पितृ दोष और उससे जुड़े प्रभाव धार्मिक मान्यताओं का विषय हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य के तौर पर नहीं देखा जाता। इसलिए इनसे जुड़े विश्वासों को धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भ में ही समझना उचित है।
नई पीढ़ी को पूर्वजों से जोड़ता है पितृपक्ष
पितृपक्ष केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। इसे परिवार की पिछली पीढ़ियों को याद करने और उनके योगदान को सम्मान देने के अवसर के रूप में भी देखा जाता है। इस दौरान परिवार के बड़े सदस्य बच्चों और नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों के बारे में बताते हैं। पूर्वजों की जीवन यात्रा, परिवार के लिए उनके योगदान और उनसे जुड़ी यादों को साझा करने से नई पीढ़ी अपने परिवार की परंपराओं से जुड़ती है। इस तरह पितृपक्ष धार्मिक आस्था के साथ-साथ पारिवारिक स्मृतियों और सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का माध्यम भी बनता है।
श्रद्धा और कृतज्ञता है पितृपक्ष का मूल भाव
पितृपक्ष में तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे कर्मों को धार्मिक महत्व दिया गया है। परिवार अपनी परंपरा, क्षेत्रीय रीति-रिवाज और पुरोहितों के मार्गदर्शन के अनुसार इन अनुष्ठानों को पूरा करते हैं। कुल मिलाकर पितृपक्ष का मूल भाव अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करना, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और परिवार की परंपराओं को आगे बढ़ाना है। 26 सितंबर से शुरू होने वाले पितृपक्ष के दौरान देशभर में लोग अपने पूर्वजों का स्मरण करेंगे और अपनी-अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार श्राद्ध, तर्पण तथा दान-पुण्य करेंगे।