नई दिल्ली. दिल्ली पुलिस की जैतपुर पुलिस स्टेशन में तैनात हेड कॉन्स्टेबल चंचल ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है जो पूरे बल के लिए गर्व का विषय बन गई है। पिछले साल नवंबर से लेकर अब तक उन्होंने लगातार मेहनत करके 119 लापता बच्चों को उनके परिवारों से मिलाया है। दक्षिण-पूर्व जिले के पुलिस उपायुक्त उत्कर्ष ने उनकी इस मेहनत की सराहना करते हुए बताया कि यह काम सामान्य नहीं बल्कि असाधारण है। चंचल ने न सिर्फ बच्चों को खोजा बल्कि उन्हें सुरक्षित उनके माता-पिता तक पहुंचाया। उनकी इस लगन और समर्पण ने कई परिवारों के चेहरों पर मुस्कान लौटा दी है। यह उपलब्धि दिल्ली पुलिस की छवि को और मजबूत करने वाली साबित हुई है।
एक साल में 119 बच्चों की सफल बरामदगी
हेड कॉन्स्टेबल चंचल ने एक साल की अवधि में कुल 119 लापता बच्चों को ढूंढ निकाला। इनमें 14 साल से कम उम्र के 41 बच्चे शामिल हैं और सबसे छोटा बच्चा लगभग तीन साल का था। ये बच्चे सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं थे बल्कि झारखंड बिहार सहित देश के कई हिस्सों से जुड़े थे। बच्चों को ढूंढने के बाद उन्हें उनके परिवारों से मिलाया गया जिससे कई माता-पिता की लंबी तलाश खत्म हुई। चंचल ने हर मामले में धैर्य और लगन से काम किया। उनकी इस निरंतरता ने साबित कर दिया कि सही दिशा में मेहनत करने से असंभव लगने वाले काम भी संभव हो सकते हैं।
दिल्ली पुलिस स्टैंडिंग ऑर्डर 2024 के तहत मिलेगी पदोन्नति
दिल्ली पुलिस स्टैंडिंग ऑर्डर 2024 के अनुसार जो पुलिसकर्मी एक साल में कम से कम 80 लापता बच्चों को ढूंढ निकालते हैं और उनमें 14 साल से कम उम्र के कम से कम 40 बच्चे शामिल हों वे आउट ऑफ टर्न प्रमोशन के पात्र हो जाते हैं। हेड कॉन्स्टेबल चंचल ने इन दोनों शर्तों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। उन्होंने 119 बच्चों को बरामद किया जिनमें 41 बच्चे 14 साल से कम उम्र के हैं। इस उपलब्धि के आधार पर अब वे समय से पहले पदोन्नति पाने की हकदार बन गई हैं। पुलिस उपायुक्त उत्कर्ष ने पुष्टि की है कि चंचल इस प्रावधान के तहत प्रमोशन के लिए पूरी तरह योग्य हैं।
मां होने के नाते मिली गहरी प्रेरणा
हेड कॉन्स्टेबल चंचल ने बताया कि उन्हें इस काम की प्रेरणा उन माता-पिता की तकलीफ देखकर मिली जिनके बच्चे लापता हो गए थे। खुद एक मां होने के नाते वे उनकी पीड़ा को गहराई से समझती हैं। उनकी खुद की आठ साल की बेटी है इसलिए लापता बच्चों के परिवारों का दर्द उन्हें और करीब से महसूस होता है। जैतपुर पुलिस स्टेशन में तैनाती के दौरान उन्होंने कई परिवारों की बेबसी देखी। इसी भावना ने उन्हें लापता बच्चों को खोजने और उन्हें उनके परिवारों से मिलाने की जिम्मेदारी उठाने के लिए प्रेरित किया। उनकी यह संवेदनशीलता पूरे अभियान की असली ताकत बनी।
अधिकारियों के सहयोग से मिली बड़ी सफलता
चंचल ने स्पष्ट किया कि अकेले उनके प्रयास पर्याप्त नहीं होते अगर स्टेशन हाउस ऑफिसर यानी SHO वरिष्ठ अधिकारियों और डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस यानी DCP का सहयोग न मिलता। तकनीकी सहायता और जरूरी जानकारी उपलब्ध कराने में इन अधिकारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके लगातार मार्गदर्शन और समर्थन से ही चंचल अपना लक्ष्य हासिल कर सकीं। पिछले डेढ़ साल से जैतपुर पुलिस स्टेशन में तैनात चंचल ने बताया कि टीम वर्क के बिना इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को ढूंढ पाना संभव नहीं था। अधिकारियों के सहयोग ने उनके काम को और प्रभावी बना दिया।
कई राज्यों तक फैला खोज अभियान
इस पूरे अभियान का दायरा दिल्ली तक सीमित नहीं रहा बल्कि देश के लगभग सात से आठ राज्यों तक फैला हुआ था। झारखंड बिहार और अन्य राज्यों से जुड़े लापता बच्चों के मामले भी चंचल ने सुलझाए। विभिन्न राज्यों की पुलिस और एजेंसियों के साथ समन्वय बनाकर उन्होंने बच्चों की तलाश जारी रखी। कई मामलों में लंबे समय से लापता बच्चों को ढूंढकर परिवार से मिलाया गया। इस व्यापक अभियान ने दिखाया कि सही समन्वय और लगन से अंतर्राज्यीय स्तर पर भी प्रभावी परिणाम निकाले जा सकते हैं। चंचल की मेहनत ने कई दूरदराज के परिवारों तक राहत पहुंचाई है।