जौनपुर. देश में कृषि क्षेत्र को आर्थिक रूप से अधिक सक्षम बनाने और किसानों की आय के नए स्रोत विकसित करने की दिशा में अब ऊर्जा उत्पादन को भी महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने 5 नवंबर को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के मुंगरा बादशाहपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में किसानों को लेकर इसी तरह की महत्वाकांक्षी योजना का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि किसानों को केवल अन्नदाता तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें ऊर्जादाता और ईंधनदाता बनाने की दिशा में भी प्रयास होने चाहिए। इस सोच के पीछे कृषि को ऊर्जा अर्थव्यवस्था से जोड़ने की व्यापक अवधारणा है, जिसमें किसान खाद्यान्न उत्पादन के साथ देश की ईंधन जरूरतों को पूरा करने में भी योगदान दे सकेंगे। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नए निवेश, रोजगार और उद्यमिता के अवसर पैदा होने की संभावनाएं हैं।
पानी से हाइड्रोजन तैयार करेंगे किसान, परिवहन क्षेत्र में होगा इस्तेमाल
नितिन गडकरी ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मार्गदर्शन में उत्तर प्रदेश के किसानों को पानी से हाइड्रोजन तैयार करने की प्रक्रिया से जोड़ने की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है। हाइड्रोजन को भविष्य के महत्वपूर्ण वैकल्पिक ईंधनों में गिना जाता है, क्योंकि इसका उपयोग परिवहन, उद्योग और ऊर्जा उत्पादन के विभिन्न क्षेत्रों में किया जा सकता है। गडकरी के मुताबिक, इस ईंधन से विमान, कार और रेलवे इंजन चलाने की दिशा में भी संभावनाएं मौजूद हैं। उन्होंने यह भी बताया कि वह दिल्ली में हाइड्रोजन से चलने वाली कार का इस्तेमाल कर चुके हैं। पानी से हाइड्रोजन बनाने के लिए इलेक्ट्रोलिसिस जैसी तकनीक और पर्याप्त विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऐसे में इस योजना की सफलता सस्ती बिजली, उत्पादन क्षमता, आधुनिक तकनीक और आवश्यक आधारभूत ढांचे के विकास पर निर्भर करेगी।
कृषि अवशेषों से बनेगा ईंधन, पराली और गन्ने की खोई का होगा उपयोग
ऊर्जा उत्पादन की इस परिकल्पना में केवल पानी ही नहीं, बल्कि खेती से निकलने वाले अवशेषों को भी महत्वपूर्ण संसाधन के रूप में इस्तेमाल करने की बात कही गई है। गन्ने की खोई, सोयाबीन की फसल के बचे हुए हिस्से और धान की पराली जैसे कृषि अवशेषों से विभिन्न प्रकार के जैव ईंधन तैयार किए जा सकते हैं। सामान्य तौर पर इन अवशेषों को कई बार अनुपयोगी समझकर खेतों में छोड़ दिया जाता है या उनका निपटान करने के लिए किसानों को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है। यदि इन्हें व्यवस्थित तरीके से एकत्रित कर ऊर्जा उत्पादन इकाइयों तक पहुंचाया जाए, तो किसानों के लिए अतिरिक्त कमाई का रास्ता खुल सकता है। इसके साथ ही शहरों से निकलने वाले उपयोगी कचरे को भी ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया से जोड़ने की संभावनाएं हैं। इससे कचरा प्रबंधन और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन की चुनौतियों का एक साथ समाधान निकालने में मदद मिल सकती है।
इथेनॉल उत्पादन से बढ़ेगी किसानों की कमाई, मक्का और गन्ने को मिलेगा बाजार
नितिन गडकरी ने इथेनॉल उत्पादन को भी किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण माध्यम बताया। मक्का, गन्ना और टूटे हुए चावल जैसे कृषि उत्पादों से इथेनॉल तैयार किया जा सकता है, जिसका इस्तेमाल पेट्रोल में मिलाकर वाहनों के ईंधन के रूप में किया जाता है। उनके अनुसार, इथेनॉल की मांग और उत्पादन बढ़ने से उत्तर प्रदेश तथा बिहार में मक्के की कीमत लगभग 1,200 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर 2,600 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है। उन्होंने इस बदलाव से दोनों राज्यों के किसानों को लगभग 45,000 करोड़ रुपये का लाभ होने की बात भी कही। गडकरी ने बताया कि 26 नवंबर को इथेनॉल से चलने वाली टोयोटा इनोवा पेश की जाएगी। इसके अलावा दोपहिया वाहनों में भी इस तरह के ईंधन के इस्तेमाल पर काम हो रहा है। यदि इथेनॉल आधारित उद्योगों का विस्तार होता है, तो किसानों को अपनी उपज बेचने के अधिक विकल्प मिलेंगे और कृषि आधारित उद्योगों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
पराली से विमान ईंधन और सड़क निर्माण, कृषि कचरे का बढ़ेगा आर्थिक महत्व
कृषि अवशेषों का इस्तेमाल केवल जैव ईंधन तक सीमित नहीं रह सकता। गडकरी ने खेती से विमान ईंधन तैयार करने और धान की पराली से सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाला बिटुमेन बनाने की संभावनाओं का भी उल्लेख किया। विमानन क्षेत्र में टिकाऊ विमानन ईंधन की मांग बढ़ रही है और कृषि अवशेष इसके उत्पादन के लिए संभावित कच्चे माल के रूप में उभर रहे हैं। दूसरी ओर, पराली से सड़क निर्माण में उपयोगी सामग्री तैयार करने की तकनीक किसानों के लिए अतिरिक्त आय का माध्यम बन सकती है। इससे खेतों में पराली जलाने की समस्या को कम करने में भी सहायता मिल सकती है। यदि कृषि अवशेषों के संग्रहण, प्रसंस्करण और औद्योगिक उपयोग के लिए स्थानीय स्तर पर सुविधाएं विकसित की जाती हैं, तो गांवों में नए रोजगार पैदा हो सकते हैं। इस प्रकार कृषि अपशिष्ट को आर्थिक संसाधन में बदलने की अवधारणा पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण औद्योगिकीकरण दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
पेट्रोलियम आयात पर खर्च होते हैं 22 लाख करोड़, ऊर्जा निर्यातक बन सकता है उत्तर प्रदेश
गडकरी के अनुसार, भारत हर साल लगभग 22 लाख करोड़ रुपये पेट्रोलियम पदार्थों के आयात पर खर्च करता है। इतनी बड़ी राशि का विदेशों में जाना देश की अर्थव्यवस्था, विदेशी मुद्रा भंडार और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण विषय है। यदि घरेलू स्तर पर इथेनॉल, हाइड्रोजन, जैव ईंधन और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का उत्पादन बढ़ाया जाता है, तो आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश भविष्य में केवल ऊर्जा खरीदने वाला राज्य नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों को ऊर्जा उपलब्ध कराने वाला राज्य भी बन सकता है। इसके लिए कृषि आधारित जैव ईंधन संयंत्रों, हाइड्रोजन उत्पादन इकाइयों, प्रसंस्करण केंद्रों और आधुनिक परिवहन सुविधाओं का विस्तार महत्वपूर्ण होगा। हालांकि, इस परिकल्पना को वास्तविकता में बदलने के लिए सस्ती ऊर्जा, तकनीकी निवेश, सुरक्षित भंडारण और किसानों को उचित मूल्य देने वाली व्यवस्था विकसित करनी होगी। यदि इन चुनौतियों का प्रभावी समाधान निकलता है, तो किसान पारंपरिक खेती के साथ देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेंगे।