नई दिल्ली: हर साल कोलकाता की सड़कों पर लाखों की भीड़ के साथ मनाया जाने वाला 21 जुलाई का 'शहीद दिवस' इस बार नई कोलकाता की सीमाओं को पार कर चुका है। एनसीपीआई (NCPI) ने इस बार अपनी राजनीतिक रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए दिल्ली के राजघाट को अपना केंद्र बनाया है। पार्टी के कद्दावर नेता और सांसद काकली घोष दस्तीदार और सुदीप बंद्योपाध्याय के नेतृत्व में आयोजित होने वाली यह 'शहीद स्मरण सभा' राष्ट्रीय राजधानी की सियासत में नई हलचल पैदा करने के लिए तैयार है।
दिल्ली से राष्ट्रीय राजनीति को संदेश
पार्टी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, संसद के आगामी मानसून सत्र के ठीक पहले राजघाट पर होने वाला यह आयोजन केवल एक श्रद्धांजलि सभा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। महात्मा गांधी की समाधि पर प्रार्थना सभा, मौन श्रद्धांजलि और शहीदों को नमन के माध्यम से एनसीपीआई यह संदेश देना चाहती है कि उनके मुद्दे अब क्षेत्रीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर गूंजने वाले हैं। आयोजन का मुख्य उद्देश्य लोकतांत्रिक मूल्यों के हनन और शहीद हुए कार्यकर्ताओं के प्रति न्याय की मांग को देश की राजधानी से मजबूती से उठाना है।
निष्पक्ष जांच का मुद्दा और काकली का तेवर
इस कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करते हुए काकली घोष दस्तीदार ने एक स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि "शहीद किसी विशेष दल की संपत्ति नहीं होते, वे उस समाज की धरोहर हैं जिसने देश की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर किए।" काकली ने अपनी मांग को दोहराते हुए कहा कि 21 जुलाई की घटना की निष्पक्ष जांच समय की मांग है। वे लगातार इस मुद्दे को उठाकर विपक्षी खेमे में चर्चा का केंद्र बनी हुई हैं।
बदलती राजनीति: कोलकाता से दिल्ली तक का सफर
अब तक 21 जुलाई का दिन पश्चिम बंगाल की राजनीति तक ही सीमित रहता था, लेकिन दिल्ली के राजघाट पर होने वाला यह आयोजन एनसीपीआई की महत्वाकांक्षाओं को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। जानकारों का मानना है कि इस आयोजन के जरिए एनसीपीआई राष्ट्रीय राजनीति में अपनी उपस्थिति को और अधिक मुखर करना चाहती है। दिल्ली में होने वाला यह कार्यक्रम साबित करेगा कि पार्टी किस तरह से राज्य के मुद्दों को अब राष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने की कोशिश में है।
कोलकाता की जनसभाएं अपनी जगह हैं, लेकिन राजघाट की यह 'स्मरण सभा' एनसीपीआई के लिए एक नई राजनीतिक इबारत लिखने की कोशिश मानी जा रही है। अब देखना यह होगा कि दिल्ली की इस जमीन से उठने वाली आवाज संसद के गलियारों तक कितना असर डालती है।