पश्चिम बंगाल- चुनावी माहौल अब मुद्दों से आगे बढ़कर खान-पान की राजनीति तक पहुंच गया है। राज्य की पारंपरिक पहचान ‘झालमुड़ी’ और ‘मछली’ अब सियासी बहस का हिस्सा बन चुकी है। मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने प्रधानमंत्री Narendra Modi के झालमुड़ी खाने को ‘चुनावी स्टंट’ करार देते हुए तीखा हमला बोला है।
झालमुड़ी पर सियासत, ममता का ‘ड्रामा’ वाला आरोप
हाल ही में झारग्राम में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सड़क किनारे एक दुकान पर झालमुड़ी खाई थी। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि यह आम जनता से जुड़ाव नहीं, बल्कि एक ‘ड्रामा’ है। उन्होंने दावा किया कि जो झालमुड़ी पीएम ने खाई, वह दुकानदार ने नहीं बल्कि सुरक्षा एजेंसियों ने तैयार की थी। ममता ने इसे वोट पाने का एक दिखावटी तरीका बताया।
‘मछली पका दूंगी’—ममता का ऑफर और BJP पर हमला
ममता बनर्जी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा कि अगर प्रधानमंत्री मछली खाना चाहते हैं, तो वह खुद उनके लिए मछली बनाकर खिलाएंगी। इसके साथ ही उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि अगर पार्टी सत्ता में आई तो बंगाल में मछली, मांस और अंडे जैसे खाद्य पदार्थों पर पाबंदी लगाई जा सकती है।
BJP का पलटवार—‘डर और भ्रम फैला रही TMC’
ममता के आरोपों पर भाजपा नेता Anurag Thakur ने जवाब देते हुए कहा कि भाजपा किसी के खान-पान पर रोक नहीं लगाएगी। उन्होंने कहा कि टीएमसी जनता के बीच भ्रम और डर फैलाने की राजनीति कर रही है, जबकि भाजपा हर व्यक्ति की पसंद का सम्मान करती है।
महिलाओं की योजनाओं पर भी टकराव
बैरकपुर की रैली में ममता बनर्जी ने अपनी ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने महिलाओं को 1500 रुपये देने का वादा पूरा किया है। उन्होंने केंद्र सरकार से सवाल किया कि अगर राज्य ऐसा कर सकता है, तो देश स्तर पर क्यों नहीं।इसके साथ ही उन्होंने भाजपा की ‘मातृ शक्ति’ योजना को चुनावी वादा बताते हुए उसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए।
चुनाव आयोग और डीए विवाद
मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने राज्य सरकार को कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) के भुगतान की अनुमति नहीं दी, जबकि इसकी घोषणा चुनाव से पहले की गई थी। इस मुद्दे पर भी उन्होंने भाजपा को घेरा और कहा कि उनकी सरकार वादे नहीं, काम करती है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल का चुनाव इस बार केवल विकास और रोजगार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और खान-पान भी सियासी हथियार बन गए हैं। ‘झालमुड़ी’ और ‘मछली’ की बहस ने चुनावी माहौल को और ज्यादा दिलचस्प और गरम बना दिया है।