कोलकाता: पश्चिम बंगाल के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में एडमिशन के दौरान होने वाली धांधली पर लगाम कसने के लिए दिए गए एक बयान को लेकर राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री जगन्नाथ चट्टोपाध्याय इन दिनों सुर्खियों में हैं। अपने बयान ‘स्याटा गरम करे देबो’ (सैट गरम कर दूंगा) पर मचे सियासी बवाल के बीच अब खुद शिक्षा मंत्री ने सामने आकर स्थिति साफ की है और आलोचकों को आड़े हाथों लिया है।
“वीरभूम की भाषा बोलना बंद नहीं करूँगा”
विवाद पर कड़ा रुख अपनाते हुए शिक्षा मंत्री जगन्नाथ चट्टोपाध्याय ने कहा,“मैं वीरभूम का बेटा हूँ। अपनी ही भाषा में बात करूँगा, चाहे यह किसी को पसंद आए या न आए। वीरभूम की भाषा में बात करना बंद नहीं होगा। मैं जिस जिले का रहने वाला हूँ, वहाँ के कुछ शब्द मेरे मुँह से निकलना स्वाभाविक है। जब लोगों को यह तय करने का अधिकार है कि वे क्या खाएं, क्या पहनें और क्या बोलें, तो मेरी भाषा पर इतनी आपत्ति क्यों?”
आलोचकों पर राढ़बंग की संस्कृति के अपमान का आरोप
क्षेत्रीय वीरभूम भाषा (राढ़भूम की बोली) का समर्थन करते हुए मंत्री ने कहा कि उनके दो शब्दों को लेकर लोग बेवजह उन्हें घेर रहे हैं। उन्होंने कहा, “आप लोग ही कहते हैं कि कोई क्या खाएगा, क्या पहनेगा, इस पर किसी को कुछ नहीं कहना चाहिए। तो फिर मुझे लेकर इतनी जलन क्यों? मेरी भाषा का कोई सम्मान नहीं है क्या? जो लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं, वे दरअसल राढ़बंग (Radhbhoomi) के लोगों और वहाँ की संस्कृति का अपमान कर रहे हैं। मैं अपनी मातृभाषा के शब्द भविष्य में भी इस्तेमाल करूँगा।”
बयान के पीछे क्या था असली मकसद?
दरअसल, पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार के कार्यकाल के दौरान राज्य के विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में एडमिशन को लेकर पैसों की उगाही और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आते रहे थे। राज्य में हुए राजनीतिक उलटफेर के बाद, नई सरकार की तरफ से उच्च शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता लाने और कड़ा संदेश देने के लिए शिक्षा मंत्री ने इस क्षेत्रीय मुहावरे का इस्तेमाल किया था।
मंत्री जगन्नाथ चट्टोपाध्याय ने साफ किया कि उनके बयान का एकमात्र उद्देश्य एडमिशन में होने वाली अनियमितताओं के खिलाफ सरकार के सख्त और कड़े रुख को दिखाना था, न कि किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना।