भारत में इलेक्ट्रिक वाहन अब वैकल्पिक नहीं बल्कि मुख्यधारा का हिस्सा बनते जा रहे हैं। वित्त वर्ष 2026 के अंत तक देश में सभी वाहन सेगमेंट मिलाकर लगभग 24.5 लाख यूनिट ईवी की बिक्री दर्ज की गई। वहीं पैसेंजर इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री में लगभग 84 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई और यह आंकड़ा करीब 1.99 लाख यूनिट तक पहुंच गया, जो कुल कार रजिस्ट्रेशन का लगभग 4.5 प्रतिशत है।
बाजार में मजबूत होते प्रमुख खिलाड़ी
भारतीय इलेक्ट्रिक वाहन बाजार तेजी से परिपक्व हो रहा है और इसमें कंपनियों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। टाटा मोटर्स लगभग 39 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी के साथ सबसे आगे बनी हुई है, जिसकी लोकप्रिय गाड़ियों में नेक्सन ईवी, पंच ईवी और कर्व ईवी शामिल हैं। महिंद्रा एंड महिंद्रा ने भी तेज विस्तार करते हुए करीब 28 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल की है। वहीं एमजी मोटर इंडिया लगभग 20 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ तीसरे स्थान पर है, जिसकी प्रमुख सफलता एमजी विंडसर ईवी से जुड़ी है।
सरकारी नीतियां और सब्सिडी से बढ़ावा
भारत सरकार की पीएम ई-ड्राइव योजना इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभा रही है, जिसके तहत 2028 तक वाणिज्यिक तीन पहिया वाहन, ई-ट्रक और ई-बसों को सब्सिडी दी जा रही है। इसके अलावा कई राज्य सरकारें निजी ईवी खरीदारों को 100 प्रतिशत रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन शुल्क में छूट देकर अपनाने को बढ़ावा दे रही हैं।
कम खर्च और बढ़ता चार्जिंग नेटवर्क
इलेक्ट्रिक वाहनों की सबसे बड़ी खासियत उनकी कम लागत है। पारंपरिक पेट्रोल वाहनों की तुलना में ईवी का रखरखाव खर्च लगभग 70 प्रतिशत तक कम होता है। जहां पेट्रोल वाहनों का खर्च प्रति किलोमीटर लगभग 7 से 8 रुपये तक होता है, वहीं इलेक्ट्रिक वाहनों में यह घटकर लगभग 1 से 2 रुपये प्रति किलोमीटर रह जाता है। देशभर में चार्जिंग नेटवर्क भी तेजी से बढ़ रहा है, जिसे केंद्र सरकार के नए चार्जिंग स्टेशनों की मंजूरी से और गति मिल रही है।