बस्तर/नई दिल्ली: भारत के आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में सोमवार का दिन एक युगांतरकारी और ऐतिहासिक मोड़ लेकर आया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ के बस्तर (Bastar) में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए बेहद दृढ़ता के साथ ऐलान किया कि अब भारत पूरी तरह से नक्सलवाद और माओवाद के दंश से मुक्त हो चुका है।
गृह मंत्री अमित शाह ने गर्व के साथ घोषणा करते हुए कहा, "मैं आज अत्यंत गर्व के साथ पूरे देश को यह बताना चाहता हूँ कि भारतवर्ष अब संपूर्ण रूप से माओवादी और नक्सल मुक्त (India Is Naxal Free) हो चुका है।"
घोषणा के लिए आखिर 'बस्तर' को ही क्यों चुना?
बस्तर का इतिहास बेहद खूनी और दर्दनाक रहा है। 6 अप्रैल 2010 को बस्तर में माओवादियों ने घात लगाकर सीआरपीएफ (CRPF) के 76 वीर जवानों पर हमला कर उन्हें शहीद कर दिया था, जो सुरक्षाबलों पर हुआ अब तक का सबसे बड़ा हमला था। इसके बाद से 'बस्तर' शब्द देश के लिए आतंक, खून-खराबे और पिछड़ेपन का पर्याय बन गया था।
मोदी सरकार यह अच्छी तरह जानती थी कि अगर देश से नक्सलवाद का खात्मा करना है, तो इसकी आखिरी लड़ाई बस्तर के जंगलों में ही जीती जा सकती है। जिस जगह को कभी लाल आतंक का 'हार्टलैंड' या गढ़ माना जाता था, आज उसी धरती से नक्सलवाद के अंत की घोषणा कर केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आंतरिक सुरक्षा की मजबूती का एक बड़ा संदेश दिया है।
"2026 में बस्तर को मिली वास्तविक आजादी"
अमित शाह ने बस्तर के दर्द को बयां करते हुए कहा कि भले ही बाकी भारत को 1947 में अंग्रेजों से आजादी मिल गई थी, लेकिन बस्तर के आम आदिवासियों को वास्तविक आजादी 31 मार्च 2026 के बाद मिली है। पिछले छह दशकों से माओवादी आतंक के कारण यहाँ की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रगति पूरी तरह ठप थी। करीब 14 लाख 10 हजार लोग इस खौफ के साए में जीने को मजबूर थे। बस्तर के गांवों में सूरज ढलने के बाद घरों से निकलना अघोषित रूप से प्रतिबंधित था।
आंकड़ों में समझिए सुरक्षाबलों की कामयाबी
यह ऐतिहासिक सफलता रातों-रात नहीं मिली है। साल 2019 से ही मोदी सरकार ने इस दिशा में 'जीरो टॉलरेंस' नीति के तहत काम शुरू किया था, जिसमें 2023 में छत्तीसगढ़ में बीजेपी सरकार आने के बाद और तेजी आई।
बड़े एनकाउंटर: साल 2024 में सुरक्षाबलों ने विशेष अभियानों में 224 माओवादियों को ढेर किया। वहीं साल 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर करीब 400 तक पहुंच गया।
आत्मसमर्पण: पिछले 10 वर्षों में 10,000 से अधिक सशस्त्र नक्सलियों ने सरकार की नीतियों से प्रभावित होकर अपने हथियार डाले और मुख्यधारा में वापस लौटे।
बलिदान: सुरक्षाबलों के लिए बस्तर का दुर्गम भूगोल हमेशा से एक बड़ी चुनौती था। इस दो दशक की लड़ाई में माओवादियों की गोलियों से देश के करीब 1,300 जवान शहीद हुए, जबकि मुखबिरी के शक में नक्सलियों ने 1,800 से अधिक बेकसूर नागरिकों की हत्या कर दी थी।
अब 'सुरक्षा मॉडल' से 'विकास मॉडल' बनेगा बस्तर
नक्सलवाद की कमर तोड़ने के बाद अब सरकार बस्तर के विकास पर पूरा ध्यान केंद्रित कर रही है। केंद्र सरकार की 'डुअल स्ट्रैटजी' (दोहरी रणनीति) के तहत एक तरफ जहां नक्सलियों का सफाया किया गया, वहीं दूसरी तरफ युद्ध स्तर पर पक्की सड़कें, मोबाइल टावर, बैंकिंग सेवाएं, स्कूल और विश्वस्तरीय स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाए गए हैं।
इसी विकास योजना को आगे बढ़ाने के लिए मंगलवार को बस्तर की धरती पर 26वीं सेंट्रल जonal काउंसिल (केंद्रीय क्षेत्रीय परिषद) की एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों ने हिस्सा लिया। इसका उद्देश्य क्षेत्र में सरकारी और निजी निवेश को तेजी से बढ़ाना है।
सुरक्षा कैंप अब बनेंगे 'जन सेवा केंद्र'
अमित शाह ने बस्तर के भविष्य का ब्लूप्रिंट पेश करते हुए एक और बड़ी घोषणा की। उन्होंने कहा कि बस्तर के दुर्गम जंगलों और गांवों में तैनात किए गए सुरक्षाबलों के कैंपों (सैन्य छावनियों) को अब स्थायी रूप से 'जन सेवा केंद्र' (Jan Seva Kendras) में बदल दिया जाएगा।
ये जन सेवा केंद्र ग्रामीणों के लिए एक ही छत के नीचे सभी नागरिक सुविधाएं प्रदान करेंगे। इसके माध्यम से सुदूर इलाकों के आदिवासियों को बैंकिंग सुविधाएं, राशन कार्ड, पहचान पत्र जैसी जरूरी नागरिक सेवाएं और सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं व भत्तों की राशि सीधे उनके खातों में मिल सकेगी। बस्तर अब अपने खूनी अतीत को पीछे छोड़ शांति और प्रगति के नए उजाले की ओर कदम बढ़ा चुका है।