कोलकाता: बंगाली सिनेमा में इन दिनों प्योर मिस्ट्री और एडवेंचर (रहस्य-रोमांच) से भरपूर कहानियों का अकाल सा दिख रहा है। ऐसे दौर में भी 'सोनादा' (Sonada) सीरीज ने दर्शकों के बीच अपना क्रेज बरकरार रखा है। निर्देशक ध्रुव बनर्जी की नई फिल्म 'सप्तदिंग गुप्तधन' (Saptadingar Guptadhan) इसी सिलसिले को और बड़े कैनवास तथा गहराई के साथ पर्दे पर लेकर आई है। यह फिल्म साबित करती है कि यह सिर्फ एक मशहूर 'फ्रेंचाइजी' के नाम पर नहीं चल रही, बल्कि इसकी जान इसकी कहानी कहने का अनोखा अंदाज है।
सुंदरवन के घने जंगलों में छिपे गुप्तधन की खोज
फिल्म की शुरुआत के करीब 20 मिनट के बाद सोनादा का अभियान दर्शकों को अपने रोमांच में इस कदर समेट लेता है कि फिर पलक झपकाने का मौका नहीं मिलता। इस बार सोनादा, अबीर और झिनुक की खोज उन्हें सुंदरवन के घने और रहस्यमयी जंगलों में ले जाती है। नदियां, घने पेड़-पौधे, बंगाल की लोककथाएं, पुराना इतिहास और गुप्तधन के सूत्र (क्लूस) मिलकर फिल्म की शुरुआत से ही एक बेहद आकर्षक और रहस्यमयी माहौल तैयार करते हैं।
निर्देशक ध्रुव बनर्जी की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उन्होंने सिर्फ रहस्य नहीं बुना, बल्कि दर्शकों को भी उस खोज का हिस्सा बना दिया है। पहेलियां इस तरह सामने आती हैं कि दर्शक खुद को किरदारों के साथ आगे बढ़ता हुआ महसूस करता है। हालांकि फिल्म के फर्स्ट हाफ में कुछ दृश्य खिंचे हुए लगते हैं, लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म रफ्तार पकड़ती है और सस्पेंस, कॉमेडी व रोमांच का बेहतरीन तालमेल देखने को मिलता है।
अबीर चटर्जी की सधी हुई एक्टिंग, अर्जुन-ईशा ने दिया साथ
अभिनय की बात करें तो अबीर चटर्जी ने एक बार फिर 'सोनादा' के किरदार को बेहद स्वाभाविक तरीके से जिया है। उन्होंने बिना किसी लाउड या ओवर-द-टॉप हीरोइस्म के, बेहद शांत और बुद्धिमान बुद्धिजीवी के रूप में अपनी उपस्थिति को विश्वसनीय बनाया है। वहीं, अर्जुन चक्रवर्ती (अबीर के किरदार में) इस बार एक कदम और आगे बढ़े हैं। उनका भुक्कड़ अंदाज और 'जेन-जी' (Gen Z) के दौर में 'बेहुला-लखिंदर' के मजेदार संदर्भों वाले दृश्य फिल्म की जान हैं। ईशा साहा ने 'झिनुक' के किरदार में फिल्म के इमोशनल हिस्से को बखूबी संभाला है।
इनके अलावा, रजतवा दत्त (दशआनन दे के रूप में) सीरीज का एक अनिवार्य हिस्सा रहे हैं। फिल्म में कौशिक गांगुली की उपस्थिति कम समय के लिए होने के बावजूद बेहद शानदार और प्रभावशाली रही है।
इतिहास और लोककथाओं का नया संगम
सप्तदिंगा गुप्तधन' का सबसे बड़ा हथियार बंगाल की लोककथाएं हैं। चांद सौदागर, मनसा देवी और बेहुला-लखिंदर की कहानियां सिर्फ काल्पनिक किस्से नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। नई पीढ़ी के लिए बनाई गई इस एडवेंचर फिल्म में इन पौराणिक कहानियों और इतिहास को सस्पेंस के साथ इस तरह बुना गया है, जो युवाओं को अपनी जड़ों और संस्कृति से रूबरू कराता है।
संगीत में बदलाव और रैप का तड़का
इस बार सोनादा सीरीज में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पहली बार इस सीरीज में संगीत निर्देशक बिक्रम घोष की जगह इन्द्रादीप दासगुप्ता ने कमान संभाली है। यह बदलाव फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर में साफ महसूस होता है। संगीत यहाँ केवल बैकग्राउंड का हिस्सा नहीं है, बल्कि कहानी को आगे बढ़ाने का काम करता है। खास तौर पर फिल्म में इस्तेमाल किया गया 'रैप' (Rap) गाना बेहद अलग हटकर है, जो केवल कानों को अच्छा नहीं लगता बल्कि कहानी के संदर्भ को भी स्पष्ट करता है।
कहाँ रह गई कमी?
फिल्म का हर पहलू एकदम परफेक्ट नहीं है। फिल्म के अंत में चांद सौदागर के वंशजों से जुड़े इमोशनल एंगल को बहुत जल्दी समेट दिया गया, जिससे उसकी गंभीरता थोड़ी कम हो गई। स्क्रीनप्ले थोड़ा और क्रिस्प (छोटा) हो सकता था। इसके अलावा, सुंदरवन के बाघ (Tiger) वाले दृश्यों में वीएफएक्स (VFX) थोड़ा कमजोर और अधूरा लगता है। हालांकि, बंगाली सिनेमा के बजट को देखते हुए इस प्रयास को सकारात्मक रूप से देखा जाना चाहिए।
सप्तदिंगा गुप्तधन' की सबसे अच्छी बात यह है कि यह एक पारिवारिक फिल्म होने के बावजूद दर्शकों को उपदेश देने या 'क्लास टीचर' बनने की कोशिश नहीं करती। यह एक नितांत मनोरंजक और ईमानदार सस्पेंस-एडवेंचर फिल्म है, जो आज के बंगाली कमर्शियल सिनेमा के बीच एक बेहतरीन और सराहनीय प्रयास बनकर उभरती है।