आज सफल फिल्ममेकर के रूप में पहचान बना चुकीं गीतू मोहनदास का बचपन उतना आसान नहीं था, जितनी उनकी वर्तमान सफलता दिखाई देती है। उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान अपने जीवन से जुड़ा ऐसा अनुभव साझा किया, जिसने वहां मौजूद लोगों को भावुक कर दिया। गीतू ने बताया कि स्कूल के दिनों में वह पढ़ाई में अच्छी नहीं थीं और कई बार परीक्षाओं में असफल भी हुईं। कम अंक आने के कारण धीरे-धीरे उनके भीतर हीनभावना पैदा होने लगी थी। उन्हें यह महसूस होने लगा था कि शायद पढ़ाई में कमजोर होने का मतलब जीवन के हर क्षेत्र में पीछे रह जाना है।
स्कूल की गतिविधियों में भी नहीं मिलता था मौका
गीतू मोहनदास के अनुसार, पढ़ाई में कमजोर होने की छवि का असर केवल परीक्षा परिणामों तक सीमित नहीं रहा। उन्हें स्कूल की कई गतिविधियों में भी अक्सर नजरअंदाज किया जाता था। खेलकूद और अन्य कार्यक्रमों में चयन न होने से उनके मन में यह धारणा बनने लगी कि शायद उनके भीतर कोई विशेष प्रतिभा नहीं है। बचपन में बार-बार मिलने वाली असफलता और उपेक्षा ने उनके आत्मविश्वास को प्रभावित किया। धीरे-धीरे वह खुद को दूसरों से कमतर समझने लगीं और उनके मन में यह सवाल उठने लगा कि क्या वह कभी जीवन में कुछ बड़ा कर पाएंगी।
निराशा के दौर में पिता ने किया सबसे अहम सवाल
जब गीतू मोहनदास लगातार असफलताओं और आत्मविश्वास की कमी से जूझ रही थीं, तब उनके पिता ने उन्हें जीवन को अलग नजरिए से देखने की प्रेरणा दी। पिता के एक सवाल ने उन्हें यह समझने में मदद की कि हर व्यक्ति की सफलता का रास्ता एक जैसा नहीं होता। पढ़ाई में अच्छे अंक न ला पाना किसी इंसान की पूरी क्षमता का पैमाना नहीं हो सकता। इसी बातचीत ने गीतू को अपनी रुचियों और वास्तविक क्षमताओं के बारे में गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित किया। यह उनके जीवन का ऐसा मोड़ साबित हुआ, जहां उन्होंने दूसरों की अपेक्षाओं के बजाय अपनी राह तलाशने की शुरुआत की।
असफलता ने सिखाया अपनी क्षमता को पहचानना
गीतू के अनुभव की सबसे बड़ी सीख यही है कि असफलता हमेशा किसी यात्रा का अंत नहीं होती। कई बार लगातार मिलने वाली निराशा व्यक्ति को अपनी वास्तविक रुचि और क्षमता पहचानने का अवसर भी देती है। स्कूल में बार-बार असफल होने वाली वही बच्ची आगे चलकर सिनेमा की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रही। उनके संघर्ष की कहानी उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा है, जो परीक्षा के अंक या किसी एक क्षेत्र में मिली असफलता के आधार पर खुद को कम आंकने लगते हैं। जीवन में प्रतिभा के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं और सफलता के लिए हर व्यक्ति का अपना समय तथा अपना क्षेत्र होता है।
फिल्म निर्माण की दुनिया में बनाई अलग पहचान
गीतू मोहनदास ने आगे चलकर फिल्म निर्माण के क्षेत्र को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया और अपनी रचनात्मक क्षमता के दम पर अलग पहचान स्थापित की। उनकी यात्रा यह दिखाती है कि बचपन की असफलताएं किसी व्यक्ति की अंतिम पहचान तय नहीं करतीं। जिस छात्रा को कभी स्कूल में अपनी जगह तलाशने में मुश्किल महसूस होती थी, वही आज बड़े फिल्मी प्रोजेक्ट का निर्देशन कर रही हैं। सिनेमा की दुनिया में उनकी सफलता इस बात का उदाहरण है कि आत्मविश्वास, सही मार्गदर्शन और अपनी रुचि को पहचानने की क्षमता जीवन की दिशा बदल सकती है।
‘टॉक्सिक’ को लेकर दर्शकों में जबरदस्त उत्साह
यश अभिनीत ‘टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ को लेकर लंबे समय से दर्शकों के बीच उत्सुकता बनी हुई है। फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी गीतू मोहनदास ने संभाली है और इसी वजह से भी उनके करियर तथा व्यक्तिगत सफर को लेकर चर्चा तेज है। एक बड़े और चर्चित प्रोजेक्ट तक पहुंचने से पहले उन्होंने जिस तरह बचपन की असफलताओं और आत्म-संदेह का सामना किया, वह उनकी सफलता की कहानी को और खास बनाता है। हालांकि किसी फिल्म की सफलता केवल उसके बजट या शुरुआती उत्साह से तय नहीं होती, बल्कि दर्शकों की प्रतिक्रिया और व्यावसायिक प्रदर्शन उसके वास्तविक प्रभाव को निर्धारित करते हैं।
बच्चों की तुलना नहीं, उनकी प्रतिभा पहचानना जरूरी
गीतू मोहनदास की कहानी माता-पिता और शिक्षकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। हर बच्चे को केवल अंकों के आधार पर आंकना उसकी दूसरी क्षमताओं को नजरअंदाज करना हो सकता है। कोई बच्चा पढ़ाई में उत्कृष्ट हो सकता है, तो किसी की रुचि कला, खेल, लेखन, संगीत या किसी अन्य रचनात्मक क्षेत्र में हो सकती है। ऐसे में बच्चों को बार-बार असफलता का एहसास कराने के बजाय उनकी रुचियों को समझना और आत्मविश्वास बढ़ाना अधिक जरूरी है। गीतू के पिता की ओर से मिला प्रोत्साहन इसी बात का उदाहरण है कि परिवार का एक सकारात्मक संवाद किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल सकता है।
गीतू मोहनदास की यात्रा आखिरकार इस विश्वास को मजबूत करती है कि असफलता किसी व्यक्ति की क्षमता का अंतिम फैसला नहीं होती। स्कूल में कम अंक, बार-बार मिली निराशा और दूसरों की उपेक्षा के बावजूद यदि व्यक्ति अपनी रुचि पहचान ले और उसे सही दिशा मिले, तो वही संघर्ष आगे चलकर सफलता की सबसे मजबूत कहानी बन सकता है।