विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अफ्रीकी देशों कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा में फैल रहे इबोला संक्रमण को अंतरराष्ट्रीय चिंता की सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति घोषित कर दिया है। इस बार संक्रमण के पीछे इबोला वायरस का दुर्लभ बुंडीबुग्यो प्रकार पाया गया है, जिसके लिए अभी तक कोई स्वीकृत टीका या विशेष उपचार उपलब्ध नहीं है। स्वास्थ्य एजेंसियों के अनुसार यह प्रकोप तेजी से फैल रहा है और अब तक 139 लोगों की मौत हो चुकी है। करीब 600 संदिग्ध मामले सामने आए हैं, जबकि 51 मामलों की आधिकारिक पुष्टि की गई है। अधिकारियों का कहना है कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है।
कितने लोग प्रभावित हुए
विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस के अनुसार, इस संक्रमण से जुड़ी मौतों की संख्या लगातार बढ़ रही है। प्रभावित इलाकों में कई दूरदराज क्षेत्र शामिल हैं, जहां स्वास्थ्य सेवाएं सीमित हैं। इसी वजह से कई मरीजों की पहचान समय पर नहीं हो सकी।
अमेरिका भी सतर्क
संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी इस संक्रमण को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है। कांगो में सेवा दे रहे एक अमेरिकी चिकित्सक संक्रमित पाए गए हैं। उन्हें इलाज के लिए जर्मनी भेजा जा रहा है। संक्रमित चिकित्सक की पहचान पीटर स्टैफर्ड के रूप में हुई है। उनके संपर्क में आए छह अन्य लोगों को भी निगरानी में रखा गया है।
कैसे फैलता है इबोला
इबोला संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थों के संपर्क से फैलता है। इसमें खून, उल्टी, मल, पसीना और संक्रमित वस्तुएं शामिल हैं। विशेषज्ञों के अनुसार लक्षण आने के बाद संक्रमण तेजी से फैलता है। इसका ऊष्मायन काल 2 से 21 दिन तक हो सकता है। शुरुआती लक्षणों में तेज बुखार, कमजोरी, उल्टी और शरीर दर्द शामिल हैं।
युगांडा तक पहुंचा संक्रमण
युगांडा में भी दो पुष्ट मामले सामने आए हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक पहला संक्रमित व्यक्ति कांगो से आया था और बाद में उसकी मौत हो गई। दूसरा मामला भी कांगो से जुड़ा माना जा रहा है। युगांडा प्रशासन ने सीमाओं पर जांच, स्वास्थ्य निगरानी और आपात प्रतिक्रिया व्यवस्था सक्रिय कर दी है।
संक्रमण की शुरुआत कैसे हुई
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 5 मई को कांगो के इतुरी प्रांत के मोंगबवालू इलाके से रहस्यमय बीमारी की सूचना मिली थी। यहां चार स्वास्थ्यकर्मियों की चार दिनों के भीतर मौत हो गई। जांच में पता चला कि पहला संक्रमित व्यक्ति 24 अप्रैल को बुनिया अस्पताल पहुंचा था। शुरुआत में सामान्य इबोला प्रकार की जांच नकारात्मक आई, लेकिन बाद में राजधानी किंशासा भेजे गए नमूनों में बुंडीबुग्यो प्रकार की पुष्टि हुई। इसी देरी से संक्रमण तेजी से फैल गया।
अंतिम संस्कार बना बड़ा कारण
स्थानीय परंपराओं के कारण संक्रमण और बढ़ गया। मृत स्वास्थ्यकर्मी के अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। शव को छूने, नहलाने और कपड़े पहनाने के दौरान कई लोग संक्रमित हो गए। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अधिकारियों का कहना है कि यही इस प्रकोप के तेज फैलाव की मुख्य वजह बनी।
बुंडीबुग्यो प्रकार क्यों अलग
बुंडीबुग्यो प्रकार की पहचान पहली बार 2007 में युगांडा में हुई थी। इबोला वायरस की छह ज्ञात प्रजातियों में यह एक दुर्लभ प्रकार है। विशेषज्ञों के मुताबिक इसकी मृत्यु दर अन्य प्रकारों से कुछ कम हो सकती है, लेकिन यह शरीर में लंबे समय तक सक्रिय रह सकता है। 2007 के प्रकोप में इसकी मृत्यु दर लगभग 32 प्रतिशत रही थी।
कोई टीका नहीं, उपचार सीमित
सबसे बड़ी चिंता यही है कि इस प्रकार के लिए अभी कोई स्वीकृत टीका उपलब्ध नहीं है। चिकित्सकों के अनुसार मरीजों को केवल सहायक उपचार दिया जा रहा है। इसमें पानी की कमी रोकना, ऑक्सीजन सहायता, रक्तचाप नियंत्रण, पोषण और दर्द प्रबंधन शामिल है।
अमेरिका ने यात्रा प्रतिबंध लगाया
अमेरिका ने कांगो, युगांडा, कांगो गणराज्य और दक्षिण सूडान से आने वाले गैर-अमेरिकी नागरिकों पर 21 दिन का प्रवेश प्रतिबंध लगाया है। इतुरी प्रांत को यात्रा न करने वाली श्रेणी में रखा गया है।
पहले भी तबाही मचा चुका इबोला
इबोला की पहचान पहली बार 1976 में हुई थी। इसे चमगादड़ों और जंगली जानवरों से इंसानों में आने वाला वायरस माना जाता है। 2014 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में इसका सबसे बड़ा प्रकोप हुआ था। उस दौरान 28,600 से अधिक मामले सामने आए और 11,000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई। कांगो में 1976 के बाद यह इबोला का 17वां आधिकारिक प्रकोप है।