किसान के लिए खेती कभी जीवन का आधार हुआ करती थी, लेकिन बदलती परिस्थितियों ने उन्हें खेत छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। उनका कहना है कि ऐसी जमीन जो घर तो देती है लेकिन भोजन नहीं दे पाती, उस जमीन से बेहतर वह जगह है जो भोजन उपलब्ध करा सके, भले ही वहां अपना घर न हो। खेती पर वर्षों तक निर्भर रहने के बाद उन्होंने परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए दिल्ली का रुख किया। अब वह अलग-अलग निर्माण स्थलों पर दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं और करीब 800 रुपये प्रतिदिन कमाते हैं। महीने की लगभग 20,000 रुपये की आय उन्हें खेती से होने वाली कमाई की तुलना में बेहतर लगती है।
किसान खेत क्यों छोड़ रहे हैं
यह किसी एक किसान की मजबूरी भर नहीं है। देश के अनेक हिस्सों में खेती की लागत, मौसम की अनिश्चितता, फसल उत्पादन में उतार-चढ़ाव और आय की अस्थिरता ने किसानों के सामने गंभीर संकट खड़ा किया है। खेती में मेहनत और जोखिम दोनों बढ़ते गए, जबकि उससे मिलने वाली निश्चित आमदनी कई परिवारों की बढ़ती जरूरतों के अनुरूप नहीं रही। ऐसे में शहरों में निर्माण, परिवहन, छोटे कारोबार और दूसरे असंगठित काम किसानों के लिए मजबूरी का विकल्प बनते जा रहे हैं। खेत छोड़ना अक्सर उनकी पहली पसंद नहीं होता, लेकिन जब कृषि से परिवार का गुजारा मुश्किल हो जाए तो पलायन जीवन चलाने की रणनीति बन जाता है।
मौसम की मार ने बढ़ाई खेती की अनिश्चितता
कृषि का संकट केवल बाजार और आय से जुड़ा हुआ नहीं है। बदलता मौसम भी किसानों की मुश्किलों को लगातार बढ़ा रहा है। कभी अनियमित बारिश, कभी लंबे सूखे की स्थिति, तो कभी अचानक तेज बारिश और बाढ़ फसल चक्र को प्रभावित करती है। खेती में एक मौसम की गड़बड़ी पूरे साल की आय को प्रभावित कर सकती है, खासकर उन छोटे किसानों के लिए जिनके पास सीमित जमीन और आर्थिक सुरक्षा के साधन होते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम संबंधी जोखिम बढ़ने के साथ किसानों के लिए यह अनुमान लगाना भी कठिन होता जा रहा है कि बोई गई फसल अंततः कितनी उपज और आय देगी।
खेती का संकट पुरुषों को शहरों की ओर धकेल रहा
ग्रामीण परिवारों में जब खेती से पर्याप्त आय नहीं होती, तो अक्सर परिवार का पुरुष सदस्य रोजगार की तलाश में शहर चला जाता है। दिल्ली जैसे महानगर ऐसे प्रवासी श्रमिकों को निर्माण और अन्य असंगठित क्षेत्रों में काम उपलब्ध कराते हैं, लेकिन वहां भी रोजगार सुरक्षित या स्थायी नहीं होता। दिहाड़ी पर निर्भर मजदूर के सामने काम मिलने की अनिश्चितता, रहने की कठिन परिस्थितियां और सामाजिक सुरक्षा का अभाव बना रहता है। इसके बावजूद शहर का रोजगार कई परिवारों को खेत की अनिश्चित आय से अधिक आकर्षक दिखाई देता है। इस तरह कृषि से बाहर जाने की प्रक्रिया केवल रोजगार का बदलाव नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवार की पूरी सामाजिक और आर्थिक संरचना में परिवर्तन लेकर आती है।
पुरुषों के पलायन का सबसे बड़ा बोझ महिलाओं पर
जब पुरुष रोजगार के लिए शहरों की ओर चले जाते हैं, तो गांव में खेती और परिवार की जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा महिलाओं के कंधों पर आ जाता है। महिलाएं खेत की जुताई से लेकर बुआई, निराई, कटाई, पशुपालन और उपज से जुड़े अनेक कामों में सक्रिय रहती हैं। इसके साथ ही घर, बच्चों, बुजुर्गों और पानी-ईंधन जैसी घरेलू जिम्मेदारियां भी उनके हिस्से में बनी रहती हैं। यानी पुरुषों के पलायन के बाद महिलाओं का काम कम नहीं होता, बल्कि कई मामलों में और बढ़ जाता है। इसके बावजूद कृषि में महिलाओं के इस योगदान को अक्सर स्वतंत्र आर्थिक श्रम के रूप में पर्याप्त पहचान नहीं मिलती।
खेत में काम, लेकिन कमाई में हिस्सा नहीं
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं का कृषि श्रम लंबे समय से दिखाई देने वाली और अदृश्य दोनों तरह की जिम्मेदारियों के बीच बंटा रहा है। परिवार की जमीन पर काम करने वाली अनेक महिलाओं को अपने श्रम का अलग पारिश्रमिक नहीं मिलता, क्योंकि उनके काम को पारिवारिक जिम्मेदारी का हिस्सा मान लिया जाता है। इससे कृषि में महिलाओं के वास्तविक योगदान का आर्थिक मूल्य सामने नहीं आ पाता। पुरुषों के शहर चले जाने पर यह स्थिति और गंभीर हो सकती है, क्योंकि खेती की जिम्मेदारी संभालने वाली महिला के पास निर्णय लेने और संसाधनों पर नियंत्रण का अधिकार उसी अनुपात में नहीं बढ़ता। इस असमानता के कारण कृषि संकट का असर महिलाओं पर कई स्तरों पर पड़ता है।
शहर की मजदूरी राहत है या नया जोखिम
किसानों के लिए शहर में 800 रुपये प्रतिदिन की दिहाड़ी खेती की अनिश्चित आय की तुलना में राहत दे सकती है, लेकिन इसे स्थायी समाधान मानना कठिन है। निर्माण और दूसरे असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले प्रवासी श्रमिकों की आय काम की उपलब्धता पर निर्भर रहती है। उनके पास नियमित रोजगार, सुरक्षित आवास और पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा की कमी हो सकती है। शहर में कमाई बढ़ने के बावजूद परिवार को गांव और शहर के बीच बांटकर रहने की कीमत भी चुकानी पड़ती है। इसलिए ग्रामीण संकट से निकला पलायन केवल अधिक आय की कहानी नहीं है; इसके भीतर असुरक्षा, सामाजिक दूरी और जीवन की कठिन परिस्थितियां भी छिपी होती हैं।
सरकारी नीतियों की भूमिका पर उठते सवाल
कृषि संकट को केवल मौसम की समस्या मानना अधूरा होगा। किसानों की आय, सिंचाई, बीमा, ऋण, बाजार तक पहुंच, भंडारण और फसल के उचित मूल्य जैसी व्यवस्थाएं भी यह तय करती हैं कि किसान खेती में बने रह पाएगा या नहीं। यदि उत्पादन जोखिम बढ़ता है और उसके मुकाबले आर्थिक सुरक्षा पर्याप्त नहीं होती, तो खेती छोड़ने का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में सरकारी नीतियों की प्रभावशीलता केवल सहायता राशि या राहत घोषणाओं से नहीं, बल्कि इस बात से भी मापी जानी चाहिए कि वे किसान परिवार को लंबे समय तक टिकाऊ आय और जोखिम से सुरक्षा दे पा रही हैं या नहीं। खास तौर पर छोटे और सीमांत किसानों की जरूरतों को कृषि नीति के केंद्र में रखना आवश्यक है।
कृषि बचाने के लिए महिलाओं को केंद्र में रखना होगा
ग्रामीण कृषि व्यवस्था को मजबूत करने की किसी भी रणनीति में महिलाओं के श्रम और अधिकारों को केंद्र में रखना जरूरी है। खेत पर काम करने वाली महिलाओं को भूमि, ऋण, तकनीक, बाजार, प्रशिक्षण और सरकारी योजनाओं तक समान पहुंच मिलने से उनकी भूमिका केवल सहायक श्रमिक की नहीं, बल्कि कृषि निर्णय लेने वाली आर्थिक इकाई की बन सकती है। यदि पुरुषों का पलायन जारी रहता है तो महिलाओं के पास खेती की जिम्मेदारी और बढ़ेगी। ऐसे में उनके काम को मान्यता देना, आर्थिक संसाधनों तक उनकी पहुंच बढ़ाना और कृषि श्रम का उचित मूल्य सुनिश्चित करना ग्रामीण परिवारों को अधिक मजबूत बना सकता है।
खेतों से पलायन रोकना सिर्फ किसानों को बचाना नहीं
किसानों का खेती से बाहर जाना केवल एक पेशे का बदलना नहीं है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, सामाजिक ढांचे और आने वाली पीढ़ियों के रोजगार विकल्पों से जुड़ा सवाल है। यदि खेती लगातार कम आकर्षक होती गई तो आने वाले वर्षों में ग्रामीण युवाओं के लिए कृषि से जुड़ाव और कमजोर हो सकता है।किसानों का शहर जाना इस बड़े बदलाव की एक मानवीय तस्वीर है—जहां किसान अपनी जमीन इसलिए नहीं छोड़ता कि उसे खेत से मोह नहीं रहा, बल्कि इसलिए कि खेत से जीवन चलाना कठिन हो गया है। कृषि को टिकाऊ और सम्मानजनक आजीविका बनाना ही उस पलायन की जड़ पर चोट कर सकता है, जो आज हजारों परिवारों को गांव से शहर की ओर धकेल रहा है।