कुछ समय पहले तक अमेरिका और चीन के रिश्ते तीखे आरोपों, आर्थिक प्रतिबंधों और तकनीकी युद्ध से भरे हुए दिखाई दे रहे थे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार चीन पर आक्रामक हमले बोल रहे थे। कभी वह चीन को दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक ‘चोर’ बताते थे, तो कभी कोविड महामारी को खुलकर ‘चाइना वायरस’ कहने से भी नहीं हिचकते थे। दूसरी ओर चीन भी ताइवान और दक्षिण चीन सागर जैसे मुद्दों पर अमेरिका को सख्त चेतावनियां देता रहा। लेकिन अब अचानक दोनों देशों की भाषा में आई नरमी वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत दे रही है।
पेइचिंग यात्रा ने बदल दिए वैश्विक संकेत
ट्रंप की हालिया पेइचिंग यात्रा को केवल एक औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम मानना बड़ी भूल होगी। ‘ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल’ में शी जिनपिंग के साथ साझा समृद्धि और सहयोग की बातें करने वाले ट्रंप का बदला हुआ अंदाज कई रणनीतिक संकेत देता है। दोनों नेताओं के बीच सार्वजनिक प्रशंसा और कारोबारी सहयोग की चर्चाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अब खुली टकराव की राजनीति से पीछे हटने को मजबूर हो रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव किसी वैचारिक मेल का परिणाम नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक दबावों की उपज है।
ईरान संकट ने बढ़ाई वॉशिंगटन की बेचैनी
अमेरिका की मौजूदा परेशानियों की जड़ में ईरान संकट को सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शुरुआती सैन्य कार्रवाइयों के बाद वॉशिंगटन को उम्मीद थी कि सीमित अभियान के जरिए वह जल्दी रणनीतिक जीत हासिल कर लेगा, लेकिन हालात उलटे पड़ते दिखाई दिए। लंबे समय तक जारी तनाव ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था और घरेलू राजनीति दोनों पर दबाव बढ़ा दिया। बढ़ती तेल कीमतें, महंगाई और आगामी मिड-टर्म चुनावों का दबाव ट्रंप प्रशासन के लिए चुनौती बन चुका है। अमेरिकी मतदाता राष्ट्रवाद से अधिक रोजमर्रा की आर्थिक परेशानियों को महत्व देते हैं और यही चिंता अब व्हाइट हाउस को परेशान कर रही है।
चीन की अर्थव्यवस्था भी संकटों से घिरी
दूसरी तरफ चीन की स्थिति भी उतनी मजबूत नहीं दिखाई दे रही। वैश्विक व्यापार युद्ध, ऊर्जा संकट और विदेशी निवेश में गिरावट ने उसकी अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला है। वेनेजुएला से तेल आपूर्ति बाधित होने और ईरान संकट के कारण खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता ने चीन की ऊर्जा सुरक्षा को झटका दिया है। इसके चलते उत्पादन लागत तेजी से बढ़ी है और दुनिया की फैक्ट्री कहे जाने वाले चीन पर आर्थिक दबाव गहरा गया है। पहले से रियल एस्टेट संकट, युवा बेरोजगारी और पूंजी पलायन जैसी समस्याओं से जूझ रहे चीन के लिए यह स्थिति और गंभीर बनती जा रही है।
महाशक्तियों की मजबूरी ने बदले समीकरण
विश्लेषकों का मानना है कि आज अमेरिका और चीन दोनों ऐसी स्थिति में पहुंच चुके हैं, जहां खुला संघर्ष उनके आर्थिक हितों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। यही कारण है कि दोनों देशों की आक्रामकता अब व्यवहारिक समझौतों में बदलती दिखाई दे रही है। ट्रंप की पेइचिंग यात्रा को शक्ति प्रदर्शन से अधिक एक ऐसे समझौते के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें दोनों महाशक्तियां अपने-अपने आर्थिक और राजनीतिक संकटों से उबरने के लिए एक-दूसरे का सहारा तलाश रही हैं। वैश्विक राजनीति में यह बदलाव आने वाले वर्षों की नई शक्ति संरचना तय कर सकता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलता समीकरण
अमेरिका और चीन के बीच बदलते संबंध भारत के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को तेजी से मजबूत किया है, वहीं चीन के साथ सीमा तनाव और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा बनी हुई है। ऐसे में यदि वॉशिंगटन और पेइचिंग के बीच नई समझ विकसित होती है, तो भारत को अपनी कूटनीतिक रणनीति को अधिक संतुलित और बहुआयामी बनाना पड़ सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को केवल शक्ति संतुलन की राजनीति पर निर्भर रहने के बजाय अपनी आर्थिक क्षमता, क्षेत्रीय नेतृत्व और रणनीतिक स्वायत्तता को और मजबूत करना होगा, ताकि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में उसके हित सुरक्षित रह सकें।