काठमांडू: नेपाल की राजनीति में एक बड़े बदलाव के संकेत देते हुए बालेन शाह ने देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभाल लिया है। सत्ता में आते ही उन्होंने शासन प्रणाली को अधिक प्रभावी और सुव्यवस्थित बनाने के लिए ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ के सिद्धांत को अपनाने का संकेत दिया है। इस मॉडल की प्रेरणा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र की प्रशासनिक शैली से जुड़ी मानी जा रही है।
छोटा लेकिन प्रभावी मंत्रिमंडल
प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद बालेन शाह ने कैबिनेट में व्यापक फेरबदल करते हुए मंत्रियों की संख्या सीमित रखी है। नई सरकार में 14 मंत्रियों ने राष्ट्रपति भवन शीतल निवास में आयोजित समारोह में शपथ ली। यह कदम प्रशासनिक खर्च को नियंत्रित करने और निर्णय प्रक्रिया को तेज बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
मंत्रालयों का पुनर्गठन, तालमेल पर जोर
सरकार ने कई मंत्रालयों का पुनर्गठन करते हुए उन्हें आपस में विलय किया है, ताकि विभागों के बीच समन्वय बेहतर हो और नीतियों का क्रियान्वयन तेज़ी से हो सके।
- युवा एवं खेल मंत्रालय को शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय में समाहित किया गया
- पेयजल मंत्रालय को स्वास्थ्य एवं जनसंख्या मंत्रालय के साथ जोड़ा गया
- भूमि प्रबंधन, सहकारिता एवं गरीबी उन्मूलन मंत्रालय को संघीय मामलों और सामान्य प्रशासन मंत्रालय में विलय किया गया
- वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को कृषि मंत्रालय में शामिल किया गया
महत्वपूर्ण मंत्रालय पीएम के पास
प्रधानमंत्री बालेन शाह ने रक्षा, उद्योग और वाणिज्य जैसे अहम मंत्रालय अपने पास रखे हैं, जो रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इससे संकेत मिलता है कि सरकार प्रमुख नीतिगत फैसलों पर सीधे नियंत्रण बनाए रखना चाहती है।
पिछली सरकारों से अलग दृष्टिकोण
इससे पहले केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में मंत्रिमंडल में 25 मंत्री शामिल थे, जबकि अंतरिम सरकार में भी 15 मंत्री थे। नई सरकार ने संख्या घटाकर एक कॉम्पैक्ट और परिणाम-केंद्रित प्रशासनिक ढांचा अपनाया है, जो पारंपरिक व्यवस्था से अलग नजर आता है।
‘मिनिमम गवर्नमेंट’ का व्यापक अर्थ
‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ का मूल उद्देश्य सरकारी हस्तक्षेप को सीमित करते हुए प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाना है। इसमें प्रक्रियाओं को सरल बनाना, लालफीताशाही को कम करना, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना और ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देना शामिल है। इसका लक्ष्य नागरिकों को अधिक सशक्त बनाना और शासन को परिणामोन्मुख बनाना है।
आगे की चुनौतियां
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मॉडल को लागू करना चुनौतीपूर्ण होगा, क्योंकि इसके लिए मजबूत प्रशासनिक इच्छाशक्ति और संस्थागत समन्वय की आवश्यकता होगी। हालांकि, यदि यह सफल रहता है, तो नेपाल के प्रशासनिक ढांचे में दीर्घकालिक सुधार संभव हैं।