नई दिल्ली: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष ने न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया है, बल्कि दक्षिण एशिया में भारत के प्रभाव को भी नई ऊंचाइयों पर पहुँचा दिया है। कल तक भारत-विरोधी सुर अलापने वाले पड़ोसी देश- बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव अब ईंधन (Fuel) और ऊर्जा सुरक्षा के लिए नई दिल्ली की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं।
होरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बना गले की फांस
ईरान-अमेरिका युद्ध के कारण दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग, 'होरमुज़ जलडमरूमध्य' को बंद कर दिया गया है। एशिया की 90 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति इसी रास्ते से होती है। ईरान ने भारत को अपना 'मित्र देश' मानते हुए इस मार्ग से ईंधन लाने की विशेष अनुमति दी है। इसी कारण भारत के पास अब वह चाबी है जिससे पड़ोसी देशों के बुझते दीये जल सकते हैं। शेख हसीना के जाने और मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल के दौरान बांग्लादेश में भारत-विरोधी लहर चरम पर थी। लेकिन अब समीकरण बदल चुके हैं प्रधानमंत्री बनने के बाद तारिक रहमान ने पुरानी कड़वाहट भुलाकर मोदी सरकार से मदद मांगी है। बांग्लादेश अपनी जरूरत का 95% तेल और 30% गैस आयात करता है। युद्ध के कारण आपूर्ति ठप होने से वहां बिजली संकट गहरा गया है और कपड़ा उद्योग (Garment Industry) बर्बादी की कगार पर है। भारत ने पड़ोसी धर्म निभाते हुए बांग्लादेश को ईंधन की खेप भेजनी शुरू कर दी है।
मालदीव और श्रीलंका की स्थिति
श्रीलंका: आर्थिक तंगी से जूझ रहा श्रीलंका एक बार फिर ईंधन के लिए पूरी तरह भारत पर निर्भर है। भारत ने श्रीलंका को मदद का आश्वासन दिया है।
मालदीव: चीन के करीब माने जाने वाले मोहम्मद मुइज्जू की सरकार ने भी भारत से ईंधन की गुहार लगाई है। दिल्ली के सूत्रों के मुताबिक, भारत इस आवेदन पर विचार कर रहा है, हालांकि अभी अंतिम फैसला होना बाकी है।
क्या कहता है विदेश मंत्रालय?
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया है कि:
तीनों देशों की मदद की अपील पर विचार किया जा रहा है।
भारत पहले अपनी घरेलू जरूरतों और स्टॉक को सुनिश्चित करेगा।
वर्तमान में भारत में ईंधन का कोई संकट नहीं है और सरकार के पास 2 महीने का बैकअप सुरक्षित है।