पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता के बीच भारत के लिए रूस एक अहम ऊर्जा साझेदार के रूप में उभरकर सामने आया है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत को रूस से मिलने वाली कच्चे तेल की आपूर्ति में करीब 82 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जिसने संभावित ऊर्जा संकट को काफी हद तक टाल दिया है।
तनाव का असर वैश्विक बाजारों पर नजर आ रहा
दरअसल, 28 फरवरी से इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी थीं। इस भू-राजनीतिक तनाव का असर वैश्विक बाजारों पर साफ नजर आ रहा है, जिससे कई देशों के सामने ईंधन आपूर्ति और कीमतों को लेकर संकट खड़ा हो गया है। भारत, जो अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है, ऐसे किसी भी वैश्विक व्यवधान से सीधे प्रभावित हो सकता है।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उछाल की आशंका
आमतौर पर ऐसी परिस्थितियों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में उछाल और आपूर्ति में कमी की आशंका बढ़ जाती है। हालांकि, इस बार स्थिति कुछ अलग रही। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत सरकार की सक्रिय कूटनीति और घरेलू रिफाइनरियों की रणनीतिक योजना के चलते देश को इस संभावित संकट से राहत मिली है। रूस से सस्ते और स्थिर कच्चे तेल की बढ़ती आपूर्ति ने न केवल घरेलू जरूरतों को पूरा किया है, बल्कि बाजार में कीमतों को भी नियंत्रण में रखने में मदद की है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए जिस तरह विविध स्रोतों पर ध्यान केंद्रित किया है, वह एक प्रभावी रणनीति का उदाहरण है। रूस के साथ बढ़ते ऊर्जा संबंधों ने भारत को इस संकट के दौर में स्थिरता प्रदान की है। इस घटनाक्रम ने यह भी साबित किया है कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच लचीली विदेश नीति और दूरदर्शी आर्थिक निर्णय किसी भी देश को बड़े संकट से बचा सकते हैं। आने वाले समय में भी भारत के लिए ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण और रणनीतिक साझेदारियां बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली हैं।