पश्चिमी यूरोप इस समय भीषण गर्मी के ऐसे दौर से गुजर रहा है जिसने मौसम वैज्ञानिकों और प्रशासन दोनों की चिंता बढ़ा दी है। ब्रिटेन में तापमान 36 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है, जो वहां की जलवायु के लिहाज से अत्यंत असामान्य माना जाता है। फ्रांस, स्पेन और इटली सहित कई देशों में भीषण गर्मी के कारण विद्यालयों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा है, जबकि बिजली आपूर्ति व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ने लगा है। मौसम एजेंसियों ने व्यापक हीटवेव चेतावनी जारी करते हुए नागरिकों से अनावश्यक रूप से घरों से बाहर न निकलने की सलाह दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण यूरोप में अत्यधिक तापमान की घटनाएं अब पहले की तुलना में अधिक बार और अधिक तीव्र रूप में सामने आ रही हैं, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि और ऊर्जा तंत्र पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा है।
35 डिग्री का तापमान भी क्यों महसूस होता है 45 डिग्री जैसा
भारतीयों के लिए 35 डिग्री सेल्सियस का तापमान सामान्य गर्मी जैसा प्रतीत हो सकता है, लेकिन ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों में यही तापमान अत्यधिक कष्टदायक बन जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण वहां की वायुमंडलीय नमी है। ब्रिटेन चारों ओर समुद्री क्षेत्रों और अटलांटिक महासागर से घिरा होने के कारण वहां की हवा में नमी का स्तर सामान्यतः अधिक रहता है। मानव शरीर स्वयं को ठंडा रखने के लिए पसीना निकालता है, लेकिन पसीना तभी प्रभावी होता है जब वह तेजी से वाष्पित हो सके। अधिक नमी की स्थिति में पसीने का वाष्पीकरण धीमा पड़ जाता है, जिससे शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती। परिणामस्वरूप शरीर का तापमान बढ़ने लगता है और हीट एग्जॉशन, डिहाइड्रेशन तथा हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि अपेक्षाकृत कम तापमान भी वहां अत्यधिक गर्म महसूस होता है।
घरों की बनावट भी बढ़ा रही है गर्मी का असर
यूरोप और भारत के आवासीय ढांचे में मौजूद मूलभूत अंतर भी इस समस्या को और गंभीर बना देते हैं। ब्रिटेन और अधिकांश यूरोपीय देशों के घर मुख्य रूप से कठोर सर्दियों से बचाव को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। मोटी ईंटों की दीवारें, ऊष्मा रोधी छतें और सीमित वेंटिलेशन वाली संरचना सर्द मौसम में गर्मी को घर के भीतर बनाए रखने में सहायक होती हैं। लेकिन जब असामान्य गर्मी पड़ती है तो यही भवन दिनभर ऊष्मा को अवशोषित करके रात तक धीरे-धीरे छोड़ते रहते हैं। इससे घरों के भीतर का तापमान लगातार ऊंचा बना रहता है और लोगों को पर्याप्त राहत नहीं मिलती। दूसरी ओर भारत में अधिकांश पारंपरिक घरों का निर्माण गर्म जलवायु को ध्यान में रखकर किया गया है, जहां प्राकृतिक वेंटिलेशन, छायादार आंगन, ऊंची छतें, पंखे तथा अब व्यापक रूप से एयर कंडीशनर का उपयोग घरों को अपेक्षाकृत ठंडा बनाए रखने में मदद करता है।
अचानक बढ़ता तापमान शरीर को नहीं देता अनुकूलन का अवसर
भारत और यूरोप के लोगों की गर्मी सहन करने की क्षमता में भी महत्वपूर्ण अंतर देखने को मिलता है। भारत में मार्च और अप्रैल से ही तापमान धीरे-धीरे बढ़ना शुरू हो जाता है और मई-जून तक अपने चरम पर पहुंचता है। इस क्रमिक वृद्धि के कारण मानव शरीर को बदलते मौसम के अनुरूप स्वयं को ढालने का पर्याप्त समय मिल जाता है। इसके विपरीत ब्रिटेन में गर्मी अक्सर बहुत कम समय में अचानक बढ़ जाती है, जिससे शरीर को अनुकूलन का अवसर नहीं मिल पाता। जब दिन के साथ-साथ रात का तापमान भी 20 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना रहता है, जिसे 'ट्रॉपिकल नाइट्स' कहा जाता है, तब शरीर रात के समय भी पूरी तरह ठंडा नहीं हो पाता। लगातार उच्च तापमान और अपर्याप्त विश्राम के कारण विशेष रूप से बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों के लिए स्वास्थ्य जोखिम कई गुना बढ़ जाते हैं।
शहरी क्षेत्रों में 'अर्बन हीट आइलैंड' प्रभाव बना अतिरिक्त चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार बड़े शहरों में कंक्रीट की इमारतें, डामर की सड़कें, सीमित हरित क्षेत्र और वाहनों से निकलने वाली ऊष्मा 'अर्बन हीट आइलैंड' प्रभाव को जन्म देती है। इस स्थिति में शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में कई डिग्री अधिक बना रहता है। लंदन जैसे महानगरों में यह प्रभाव हीटवेव के दौरान और अधिक तीव्र हो जाता है। दिनभर इमारतें और सड़कें सूर्य की ऊष्मा को अपने भीतर संग्रहित कर लेती हैं और रात के समय उसे धीरे-धीरे छोड़ती रहती हैं। इससे रात में भी पर्याप्त ठंडक नहीं मिलती, जिससे लोगों की नींद, स्वास्थ्य और कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव के कारण भविष्य में ऐसी परिस्थितियां और अधिक गंभीर हो सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन ने बदल दिया यूरोप का मौसम चक्र
जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्तमान हीटवेव केवल एक मौसमी घटना नहीं बल्कि बदलती वैश्विक जलवायु का स्पष्ट संकेत है। औसत वैश्विक तापमान में लगातार वृद्धि के कारण यूरोप में गर्मी की तीव्रता, अवधि और आवृत्ति लगातार बढ़ रही है। पहले जहां ऐसे तापमान को अपवाद माना जाता था, वहीं अब यह धीरे-धीरे सामान्य प्रवृत्ति का रूप लेता दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में यूरोपीय देशों को अपने भवन निर्माण मानकों, शहरी नियोजन, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और ऊर्जा अवसंरचना में व्यापक बदलाव करने होंगे ताकि बढ़ती गर्मी से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके। साथ ही नागरिकों के बीच हीटवेव से बचाव के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता बन चुका है।