भोपाल. स्वच्छ सर्वेक्षण की प्रतिस्पर्धा अब केवल सफाई तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह शहरों की प्रशासनिक क्षमता, जनभागीदारी और व्यवस्थागत अनुशासन की बड़ी परीक्षा बन चुकी है। इसी चुनौती को स्वीकार करते हुए भोपाल नगर निगम ने इस बार अपनी कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव किया है। राजधानी भोपाल ने अब ‘सुपर स्वच्छ लीग’ में प्रवेश कर लिया है, जहां उसका मुकाबला देश के सबसे चर्चित स्वच्छ शहरों जैसे इंदौर, सूरत, नवी मुंबई, अहमदाबाद, विजयवाड़ा और लखनऊ से माना जा रहा है। इस प्रतिष्ठित सूची में शीर्ष स्थान हासिल करने के लिए नगर निगम ने पूरी प्रशासनिक मशीनरी को मैदान में उतार दिया है।
कमिश्नर संस्कृति जैन ने खुद संभाली कमान
भोपाल नगर निगम आयुक्त संस्कृति जैन इस पूरे अभियान की निगरानी स्वयं कर रही हैं। उनके नेतृत्व में 106 नोडल अधिकारियों की विशेष टीम बनाई गई है, जिन्हें शहर के अलग-अलग हिस्सों में जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन अधिकारियों को केवल निरीक्षण तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उन्हें सीधे ग्राउंड जीरो पर रहकर सफाई व्यवस्था, कचरा प्रबंधन, सड़क सुधार और जनजागरूकता गतिविधियों की निगरानी करने के निर्देश दिए गए हैं। निगम प्रशासन का मानना है कि लगातार निगरानी और जवाबदेही तय किए बिना स्वच्छता रैंकिंग में बड़ा सुधार संभव नहीं है।
तंग गलियों से लेकर सरकारी क्वार्टर्स तक चला सफाई अभियान
नगर निगम की नई रणनीति का असर अब उन इलाकों में भी दिखाई देने लगा है, जो लंबे समय से उपेक्षा का शिकार माने जाते थे। शहर की संकरी गलियों, पुराने मोहल्लों और सरकारी क्वार्टर्स के पीछे के हिस्सों में विशेष सफाई अभियान चलाया जा रहा है। सुबह सूर्योदय से पहले ही सफाई कर्मचारी सड़कों की धूल हटाने, कचरा साफ करने, गड्ढों की मरम्मत और दीवारों की रंगाई-पुताई में जुट जाते हैं। कई स्थानों पर आकर्षक चित्रकारी और संदेशों के जरिए दीवारों को सुंदर बनाया जा रहा है, जिससे शहर का वातावरण पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित और स्वच्छ दिखाई देने लगा है।
लापरवाही पर सख्ती, अधिकारियों पर कार्रवाई शुरू
नगर निगम ने इस बार साफ संकेत दे दिए हैं कि स्वच्छता अभियान में किसी भी स्तर की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। पिछले दिनों कुछ वार्डों में गंदगी मिलने के बाद दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया, जबकि कई अन्य कर्मचारियों और अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। प्रशासन का मानना है कि केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका धरातल पर प्रभावी क्रियान्वयन अधिक महत्वपूर्ण है। इसी कारण अब प्रत्येक वार्ड में नियमित निरीक्षण और दैनिक रिपोर्टिंग की व्यवस्था लागू की गई है, ताकि किसी भी कमी को तुरंत सुधारा जा सके।
कम संसाधनों के बावजूद बुलंद हैं कर्मचारियों के हौसले
हालांकि भोपाल नगर निगम के पास इंदौर जैसे बड़े शहरों की तुलना में सीमित संसाधन हैं, लेकिन सफाई कर्मचारियों और फील्ड स्टाफ का उत्साह इस कमी को काफी हद तक पूरा करता दिखाई दे रहा है। अशोका गार्डन, गिन्नौरी, नारायण नगर और बिजली नगर जैसे क्षेत्रों के स्थानीय निवासियों ने भी माना है कि पिछले कुछ समय में सफाई व्यवस्था में स्पष्ट सुधार देखने को मिला है। सड़कों पर पहले की तुलना में कम कचरा दिखाई दे रहा है और कई मोहल्लों की दीवारें अब आकर्षक चित्रों से सजी नजर आ रही हैं। नगर निगम ने उत्कृष्ट कार्य करने वाले कर्मचारियों को विशेष सम्मान देने की योजना भी बनाई है, ताकि फील्ड स्तर पर काम करने वालों का मनोबल और बढ़ाया जा सके।
स्वच्छता की जंग में जनभागीदारी बनेगी सबसे बड़ी ताकत
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल प्रशासनिक प्रयासों से किसी शहर को स्थायी रूप से स्वच्छ नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए नागरिकों की सक्रिय भागीदारी भी उतनी ही जरूरी होती है। भोपाल नगर निगम अब लोगों को जागरूक करने के लिए मोहल्ला स्तर पर अभियान चलाने की तैयारी कर रहा है। कचरा पृथक्करण, सार्वजनिक स्थलों पर स्वच्छता और प्लास्टिक मुक्त वातावरण जैसे मुद्दों पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है। यदि प्रशासनिक सख्ती के साथ जनता का सहयोग भी मिला, तो आने वाले समय में भोपाल देश के सबसे स्वच्छ शहरों की सूची में बड़ी छलांग लगा सकता है।