खजुराहो. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने शुक्रवार को खजुराहो में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना की समीक्षा बैठक की और अधिकारियों को परियोजना से प्रभावित गांवों में नियमित रूप से पहुंचकर लोगों की समस्याओं को समझने के निर्देश दिए। पन्ना और छतरपुर जिलों के प्रभावित क्षेत्रों का विशेष रूप से दौरा करने को कहा गया है, ताकि पुनर्वास और विस्थापन से जुड़ी वास्तविक समस्याओं का मौके पर आकलन किया जा सके। मुख्यमंत्री ने कहा कि केन-बेतवा परियोजना बुंदेलखंड के लिए विकास का महत्वपूर्ण आधार बनने जा रही है और इससे सिंचाई, पेयजल तथा ऊर्जा के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन की संभावना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी बड़ी विकास परियोजना की सफलता केवल उसके निर्माण से नहीं, बल्कि उससे प्रभावित लोगों के जीवन में आने वाले सकारात्मक बदलाव से तय होती है। इसी दृष्टिकोण के साथ सरकार ने प्रभावित और विस्थापित परिवारों के हितों को परियोजना की निगरानी में प्रमुख स्थान देने के निर्देश दिए हैं।
विस्थापित परिवारों तक पहुंचेगी सरकारी योजनाओं की सुविधा
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि जिन परिवारों को परियोजना के कारण नए स्थानों पर बसना पड़ा है, उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ उनके घर तक पहुंचाया जाए। उनका कहना है कि पात्र परिवारों को योजनाओं का लाभ लेने के लिए कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें, बल्कि प्रशासन स्वयं उनके बीच जाकर आवश्यक सुविधाओं और योजनाओं की जानकारी तथा लाभ उपलब्ध कराए। पुनर्वास की प्रक्रिया में केवल आवास उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं माना जा सकता, क्योंकि नए स्थान पर बसने के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सामुदायिक जीवन की आवश्यकताएं भी जुड़ी होती हैं। इसी कारण मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से प्रभावित परिवारों की जरूरतों का स्थानीय स्तर पर आकलन करने और उनके आधार पर योजनाओं को लागू करने को कहा। सरकार का यह रुख परियोजना से जुड़े विकास और मानवीय पुनर्वास के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
नए पुनर्वास स्थलों पर स्कूल और स्वास्थ्य केंद्रों की तैयारी
मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया कि जिन प्रभावित परिवारों ने नए स्थानों पर निवास बना लिया है, वहां मूलभूत सुविधाओं के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार की जाए। इन सुविधाओं में विद्यालय, आंगनबाड़ी केंद्र, स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक भवन जैसे संस्थानों को प्रमुखता दी गई है। पुनर्वासित परिवारों के लिए बच्चों की शिक्षा, महिलाओं और बच्चों के पोषण तथा प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि इन सुविधाओं का अभाव रहता है तो नए स्थान पर बसने के बाद भी विस्थापित परिवारों की सामाजिक कठिनाइयां बनी रह सकती हैं। मुख्यमंत्री ने इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए संबंधित विभागों को समन्वय के साथ कार्ययोजना तैयार करने और उसे समयबद्ध तरीके से लागू करने के निर्देश दिए। इससे पुनर्वासित गांवों को केवल नए आवासों का समूह बनाने के बजाय व्यवस्थित सामाजिक बस्तियों के रूप में विकसित करने की दिशा में काम किया जा सकेगा।
अतिरिक्त सहायता राशि के भुगतान में तेजी के निर्देश
समीक्षा बैठक में पन्ना की रूंझ-मझगांव परियोजना से प्रभावित परिवारों के आर्थिक हितों पर भी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने संबंधित अधिकारियों को स्वीकृत अतिरिक्त राशि का भुगतान जल्द से जल्द करने के निर्देश दिए। विस्थापन की प्रक्रिया में परिवारों के सामने आजीविका, संपत्ति और पुनर्वास से जुड़े कई प्रकार के आर्थिक दबाव आते हैं, इसलिए निर्धारित मुआवजे और स्वीकृत अतिरिक्त सहायता का समय पर भुगतान महत्वपूर्ण माना जाता है। मुख्यमंत्री ने यह भी निर्देश दिया कि जिन प्रभावित लोगों के पास आयु संबंधी दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, उनकी उम्र का निर्धारण चिकित्सा परीक्षण के आधार पर किया जाए। इसका उद्देश्य पात्र लोगों को दस्तावेजों की कमी के कारण मिलने वाले लाभ से वंचित होने से बचाना है। प्रशासनिक प्रक्रिया में ऐसे व्यावहारिक समाधान अपनाने से पुनर्वास से जुड़े मामलों को तेजी से निपटाने में मदद मिल सकती है।
गांव-गांव निगरानी और विभागों के बीच समन्वय पर जोर
मुख्यमंत्री ने जल संसाधन विभाग के अधिकारियों को परियोजना की नियमित निगरानी करने के साथ-साथ विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने को कहा। केन-बेतवा जैसी बहुस्तरीय परियोजना में जल संसाधन, राजस्व, वन, ऊर्जा, ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा सहित कई विभागों की भूमिका होती है। ऐसे में किसी एक विभाग की धीमी प्रक्रिया का असर पुनर्वास या परियोजना के दूसरे हिस्सों पर भी पड़ सकता है। मुख्यमंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट को भी परियोजना की गांव-गांव निगरानी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। सरकार का जोर यह है कि परियोजना की प्रगति केवल राजधानी या जिला मुख्यालय से रिपोर्टों के आधार पर न देखी जाए, बल्कि अधिकारियों की प्रत्यक्ष मौजूदगी के माध्यम से जमीनी स्थिति का लगातार आकलन किया जाए।
सिंचाई और पेयजल के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद
केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को बुंदेलखंड की जल समस्या से निपटने वाली महत्वपूर्ण परियोजनाओं में गिना जा रहा है। परियोजना पूरी होने के बाद मध्यप्रदेश में करीब 8.11 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता बढ़ने की उम्मीद जताई गई है। इसके अलावा 44 लाख से अधिक लोगों को पेयजल सुविधा उपलब्ध होने का अनुमान है, जिससे पानी की कमी से प्रभावित क्षेत्रों में दीर्घकालिक बदलाव की संभावना बनती है। बुंदेलखंड में कृषि और ग्रामीण जीवन पर पानी की उपलब्धता का सीधा असर पड़ता है, इसलिए सिंचाई के विस्तार से खेती की उत्पादकता और किसानों की आय में सुधार की संभावनाएं भी जुड़ी हुई हैं। पेयजल की बेहतर उपलब्धता से ग्रामीण परिवारों, महिलाओं और बच्चों पर पानी जुटाने का दबाव कम हो सकता है। हालांकि इन लक्ष्यों को वास्तविक लाभ में बदलने के लिए परियोजना के निर्माण, वितरण तंत्र और स्थानीय जल प्रबंधन की प्रभावी निगरानी भी उतनी ही जरूरी होगी।
बिजली उत्पादन से ऊर्जा क्षमता को भी मिलेगा सहारा
परियोजना में जल विद्युत के साथ सौर ऊर्जा उत्पादन का भी प्रावधान किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसमें 103 मेगावाट जल विद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन की योजना शामिल है। इससे परियोजना का उद्देश्य केवल सिंचाई और पेयजल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि क्षेत्र की ऊर्जा जरूरतों के साथ भी जुड़ जाता है। बुंदेलखंड के कई हिस्सों में कृषि और ग्रामीण विकास के लिए बिजली की विश्वसनीय उपलब्धता महत्वपूर्ण है, ऐसे में अतिरिक्त ऊर्जा क्षमता स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी समर्थन दे सकती है। जल और ऊर्जा के इस संयुक्त उपयोग से परियोजना को बहुउद्देश्यीय स्वरूप मिलता है। हालांकि इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन परियोजना के पूर्ण होने और उत्पादन क्षमता के प्रभावी संचालन के बाद ही किया जा सकेगा।
1,382 गांवों को मिलने वाला है प्रत्यक्ष लाभ
मुख्यमंत्री ने बताया कि केन-बेतवा लिंक परियोजना से बुंदेलखंड और मध्य भारत के कई जिलों के लगभग 1,382 गांवों को प्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावना है। इनमें पन्ना, दमोह, छतरपुर, टीकमगढ़, निवाड़ी, सागर, विदिशा, रायसेन, शिवपुरी और दतिया जिले शामिल हैं। इतने बड़े भौगोलिक क्षेत्र में परियोजना का प्रभाव पड़ने का अर्थ है कि इसके लाभ और चुनौतियां भी व्यापक स्तर पर सामने आएंगी। सिंचाई और पेयजल के विस्तार से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिलने की उम्मीद है, वहीं विस्थापन और पुनर्वास से जुड़े मामलों में संवेदनशील प्रशासनिक दृष्टिकोण आवश्यक होगा। बैठक में खजुराहो सांसद वी.डी. शर्मा, वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री दिलीप अहिरवार सहित कई विधायक और जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। सरकार की ओर से दिए गए निर्देशों से संकेत मिलता है कि परियोजना की निगरानी में अब विकास कार्यों के साथ प्रभावित परिवारों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को भी समान महत्व देने पर जोर रहेगा।
विकास की रफ्तार के साथ मानवीय संवेदनशीलता की परीक्षा
केन-बेतवा परियोजना बुंदेलखंड के लिए जल, कृषि और ऊर्जा के क्षेत्र में संभावित बदलाव का बड़ा माध्यम बन सकती है, लेकिन इसके साथ जुड़े विस्थापन और पुनर्वास के सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। किसी भी बड़ी आधारभूत परियोजना का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होता है कि उससे मिलने वाले लाभ कितने व्यापक हैं और उसकी वजह से प्रभावित लोगों के अधिकारों तथा जीवन की गुणवत्ता की कितनी प्रभावी रक्षा की गई। मुख्यमंत्री मोहन यादव के निर्देशों में इसी संतुलन पर विशेष जोर दिखाई देता है। यदि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में पुनर्वासित परिवारों के घर तक पहुंचता है, स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र समय पर बनते हैं तथा मुआवजे और सहायता राशि के मामलों का शीघ्र समाधान होता है, तो परियोजना का सामाजिक प्रभाव और अधिक सकारात्मक हो सकता है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि समीक्षा बैठक में दिए गए निर्देश जमीनी स्तर पर कितनी तेजी और प्रभावशीलता के साथ लागू होते हैं।