नई दिल्ली। दुनिया एक बड़े जलवायु बदलाव की ओर बढ़ रही है। ब्रिटेन के मौसम विभाग Met Office ने चेतावनी दी है कि 2026 में विकसित हो रहा El Niño पिछले एक सदी से भी अधिक समय में सबसे शक्तिशाली घटनाओं में शामिल हो सकता है। इसका सबसे बड़ा असर 2027 में दिखाई देने की आशंका है और अगले साल वैश्विक तापमान 2024 के रिकॉर्ड को पीछे छोड़कर नया रिकॉर्ड बना सकता है। Met Office के मुताबिक भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की समुद्री सतह का तापमान सामान्य से 3°C से ज्यादा ऊपर जा सकता है। आमतौर पर बड़े El Niño के दौरान यह असामान्यता करीब 2°C के आसपास होती है। इसलिए मौजूदा पूर्वानुमान को असाधारण माना जा रहा है।
2027 बन सकता है सबसे गर्म साल
Met Office के लॉन्ग-रेंज फोरकास्टिंग प्रमुख एडम स्काइफ के अनुसार, मौजूदा El Niño के कारण वैश्विक औसत तापमान में अस्थायी लेकिन तेज उछाल आ सकता है। जून 2026 में Met Office ने भी कहा था कि इस घटना के कारण 2027 के सबसे गर्म साल बनने की संभावना है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, अगर मौजूदा पूर्वानुमान सही साबित होते हैं तो 2027, 2024 के रिकॉर्ड गर्म साल को पीछे छोड़ सकता है। कुछ अनुमान वैश्विक तापमान को पूर्व-औद्योगिक स्तर से करीब 1.7°C तक ऊपर ले जाने की संभावना भी जता रहे हैं। हालांकि यह अभी एक पूर्वानुमान है, अंतिम स्थिति El Niño की वास्तविक तीव्रता और अन्य जलवायु कारकों पर निर्भर करेगी।
NOAA ने भी जताई बेहद मजबूत El Niño की आशंका
अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA के Climate Prediction Center ने 13 अगस्त 2026 की अपनी ENSO रिपोर्ट में कहा कि El Niño मजबूत हो रहा है और उत्तरी गोलार्ध की 2026-27 की शरद और सर्दियों के दौरान बहुत मजबूत El Niño बनने की संभावना 90% से ज्यादा है। NOAA के अनुसार, अक्टूबर-दिसंबर 2026 के दौरान ऐतिहासिक रूप से बेहद मजबूत घटना होने की संभावना 69% है। जुलाई में Niño-3.4 क्षेत्र का तापमान सूचकांक +1.4°C और Niño-1+2 क्षेत्र में +2.9°C दर्ज किया गया था। इससे साफ है कि यह केवल एक मॉडल का अनुमान नहीं है। अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मौसम संस्थानों के मॉडल प्रशांत महासागर में मजबूत होती गर्मी की ओर संकेत कर रहे हैं।
भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
El Niño का भारत पर सबसे बड़ा असर दक्षिण-पश्चिम मानसून के जरिए पड़ता है। आम तौर पर मजबूत El Niño भारतीय मानसून को कमजोर करने वाली परिस्थितियां पैदा करता है। हालांकि हर El Niño में भारत में बारिश का असर एक जैसा नहीं होता, क्योंकि मानसून पर Indian Ocean Dipole (IOD), Madden-Julian Oscillation (MJO) और क्षेत्रीय समुद्री-वायुमंडलीय परिस्थितियों का भी प्रभाव रहता है। भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अनुसार, IMD ने 2026 के पूरे दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए बारिश का अनुमान पहले 92% LPA लगाया था, जिसे बाद में घटाकर 90% LPA ±4% मॉडल त्रुटि किया गया। यानी इस साल मानसून सामान्य से कमजोर रहने का अनुमान है।
90% LPA का मतलब क्या है?
LPA यानी Long Period Average, किसी लंबी अवधि में दर्ज औसत मानसूनी बारिश है। यदि बारिश 90% LPA रहती है तो इसका मतलब है कि पूरे सीजन में बारिश दीर्घकालिक औसत के मुकाबले लगभग 10% कम रह सकती है। सरकार ने यह भी बताया है कि 1950 के बाद दर्ज 16 El Niño वर्षों में से 7 वर्षों में भारतीय मानसून की बारिश सामान्य से कम रही थी। यानी El Niño और कमजोर मानसून के बीच संबंध है, लेकिन यह हर बार निश्चित परिणाम नहीं देता।
खेती पर पड़ सकता है बड़ा असर
कमजोर मानसून का सीधा असर भारत की कृषि पर पड़ सकता है। खासकर वर्षा आधारित खेती वाले इलाकों में कम बारिश से बुवाई, मिट्टी की नमी और फसल उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। अगर El Niño 2027 की शुरुआत तक मजबूत रहता है, तो इसका असर केवल खरीफ फसलों तक सीमित नहीं रह सकता। जल उपलब्धता, रबी फसलों, खाद्य उत्पादन और कृषि जिंसों की कीमतों पर भी दबाव बन सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मजबूत El Niño से कॉफी, कोको, चीनी और अन्य उष्णकटिबंधीय कृषि उत्पादों की सप्लाई प्रभावित होने का जोखिम बढ़ सकता है।
2027 में भारत में भीषण गर्मी का खतरा
भारत में अगले साल तापमान को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। हालांकि भारत का औसत तापमान नया रिकॉर्ड बनाएगा या नहीं, यह कई कारकों पर निर्भर करेगा, जिसमें 2027 का मानसून और ENSO की स्थिति प्रमुख हैं। लेकिन अगर मजबूत El Niño के साथ वैश्विक पृष्ठभूमि में समुद्र और जमीन का तापमान ऊंचा रहता है तो 2027 के वसंत और गर्मियों में हीटवेव का खतरा बढ़ सकता है।
El Niño आखिर होता क्या है?
El Niño-Southern Oscillation (ENSO) एक प्राकृतिक जलवायु प्रणाली है। इसके गर्म चरण को El Niño और ठंडे चरण को La Niña कहा जाता है। El Niño के दौरान मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का समुद्री सतह तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इस गर्मी से वायुमंडलीय दबाव, हवाओं और बारिश के पैटर्न में बदलाव आता है, जिसका असर प्रशांत महासागर से हजारों किलोमीटर दूर स्थित देशों तक पहुंच सकता है। यह घटना सामान्यतः हर 2 से 7 साल के अंतराल में दिखाई देती है और आमतौर पर कई महीनों तक बनी रहती है।
क्या इस बार 2015-16 का रिकॉर्ड टूटेगा?
2015-16 का El Niño आधुनिक दौर की सबसे चर्चित और मजबूत घटनाओं में से एक था। मौजूदा पूर्वानुमानों में प्रशांत महासागर की तापमान असामान्यता उसके मुकाबले भी अधिक होने की संभावना जताई जा रही है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—3°C या उससे ज्यादा तापमान की बात पूर्वानुमान है, वर्तमान में दर्ज वास्तविक तापमान नहीं। NOAA के 13 अगस्त के आंकड़ों में पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत में +2°C से अधिक की असामान्यता दर्ज हुई थी, जबकि आगे की अवधि के लिए मॉडल बहुत मजबूत घटना की संभावना दिखा रहे हैं। इसलिए इसे अभी से निश्चित रूप से “इतिहास का सबसे विनाशकारी El Niño” कहना जल्दबाजी होगी। मौसम वैज्ञानिक भी इसकी अंतिम तीव्रता को लेकर अनिश्चितता की बात कर रहे हैं। Met Office ने जून में कहा था कि घटना के मजबूत होने के संकेत हैं, लेकिन इसकी अंतिम तीव्रता में अभी अनिश्चितता है।
भारत के लिए आने वाले महीने क्यों अहम?
भारत के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि El Niño कितनी तेजी से मजबूत होता है और 2027 की शुरुआत तक इसकी स्थिति क्या रहती है। इसके साथ भारतीय महासागर की परिस्थितियां और अगले मानसून से जुड़े अन्य जलवायु संकेत भी महत्वपूर्ण होंगे। अगर El Niño बहुत मजबूत रहता है तो कमजोर मानसून, गर्मी और कृषि क्षेत्र पर दबाव का जोखिम बढ़ सकता है। दूसरी ओर, अन्य मौसम प्रणालियां इसके प्रभाव को कुछ हद तक कम भी कर सकती हैं।
एक नजर में बड़ी बातें
- प्रशांत महासागर में El Niño तेजी से मजबूत हो रहा है।
- समुद्री सतह का तापमान सामान्य से 3°C से ज्यादा ऊपर जाने का पूर्वानुमान है।
- NOAA के मुताबिक 2026-27 में बहुत मजबूत El Niño की संभावना 90% से अधिक है।
- 2027 के सबसे गर्म साल बनने की संभावना बढ़ी है।
- IMD ने 2026 मानसून के लिए 90% LPA का अनुमान दिया है।
- कमजोर मानसून से कृषि और खाद्य कीमतों पर दबाव का खतरा बढ़ सकता है।
- 2027 में वैश्विक और क्षेत्रीय हीटवेव का जोखिम बढ़ सकता है।
निष्कर्ष: मौजूदा संकेत निश्चित तौर पर असाधारण El Niño की ओर इशारा कर रहे हैं, लेकिन इसकी अंतिम तीव्रता और भारत पर वास्तविक असर आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा। इसलिए “2027 निश्चित रूप से सबसे विनाशकारी साल होगा” कहना अभी सही नहीं होगा; फिलहाल वैज्ञानिक मॉडल इसे एक गंभीर और असामान्य जलवायु जोखिम के रूप में देख रहे हैं।