बांके बिहारी मंदिर से जुड़े विवाद पर सुनवाई करते हुए सूर्यकान्त और जोयमाला बागची की पीठ ने कहा कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति के खिलाफ लगाए गए आरोप अत्यंत गंभीर हैं और उनकी जांच आवश्यक है। अदालत ने समिति को अपना जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है तथा मामले की अगली सुनवाई 26 मई को निर्धारित की है। यह याचिका मंदिर के सेवायतों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान और अधिवक्ता तन्वी दुबे के माध्यम से दायर की गई थी।
दर्शन समय में बदलाव से बढ़ा विवाद
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने मंदिर की सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप करते हुए दर्शन के समय में बदलाव किया है। सेवायतों का कहना है कि मंदिर की समय व्यवस्था केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि भगवान की सेवा, विश्राम और जागरण जैसी धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। उनके अनुसार वर्षों से ग्रीष्म और शीत ऋतु के अनुसार अलग-अलग दर्शन व्यवस्था लागू रही है, जिसे अचानक बदल देना मंदिर की मूल परंपराओं के विपरीत माना जा रहा है।
देहरी पूजा बंद होने पर गहराया असंतोष
मामले का सबसे संवेदनशील पक्ष पारंपरिक देहरी पूजा को बंद किए जाने से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि यह पूजा गुरु-शिष्य परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है और सदियों से सेवायत गोस्वामी इसे संपन्न करते आए हैं। उन्होंने दलील दी कि यह अनुष्ठान उस समय होता था जब मंदिर आम श्रद्धालुओं के लिए बंद रहता था, इसलिए इसे भीड़ प्रबंधन से जोड़ना तर्कसंगत नहीं माना जा सकता। सेवायतों का कहना है कि धार्मिक परंपराओं को प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से समाप्त करना आस्था और संस्कृति दोनों के लिए गंभीर विषय है।
फूल बंगला सेवा और शुल्क व्यवस्था पर भी उठे सवाल
याचिका में यह आरोप भी लगाया गया कि फूल बंगला सेवा के लिए अत्यधिक शुल्क निर्धारित किए गए हैं, जिससे श्रद्धालुओं और सेवायत समाज में असंतोष बढ़ा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मंदिर की सेवाएं भक्ति और परंपरा का विषय हैं, उन्हें व्यावसायिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। अदालत में यह भी कहा गया कि हाल के प्रशासनिक बदलावों ने मंदिर की पारंपरिक पूजा प्रणाली को प्रभावित किया है और इससे धार्मिक वातावरण में असहजता पैदा हुई है।
ट्रस्ट अध्यादेश के बाद बढ़ा पूरा विवाद
यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश श्री बांके बिहारी जी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश-2025 की पृष्ठभूमि में और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इस अध्यादेश के माध्यम से मंदिर की मौजूदा प्रबंधन व्यवस्था को बदलकर राज्य नियंत्रित ट्रस्ट बनाने का प्रावधान किया गया था। इसके खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कानून के कुछ हिस्सों के क्रियान्वयन पर रोक लगाई थी और मंदिर प्रशासन की निगरानी के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश Ashok Kumar की अध्यक्षता में 12 सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया था।
अदालत के पुराने निर्देशों के बाद भी उठे नए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में स्पष्ट किया था कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति मंदिर की धार्मिक व्यवस्थाओं में कोई संरचनात्मक परिवर्तन नहीं करना चाहती। इसके बावजूद हालिया आदेशों और पूजा पद्धति में बदलाव को लेकर विवाद लगातार बढ़ता गया। सेवायत समाज का कहना है कि प्रशासनिक सुधारों के नाम पर धार्मिक परंपराओं की मूल आत्मा को प्रभावित नहीं किया जा सकता। अब अदालत इस बात पर विचार करेगी कि धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक नियंत्रण के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए।
निष्कर्ष: आस्था और परंपरा की परीक्षा बना बांके बिहारी मंदिर विवाद
बांके बिहारी मंदिर से जुड़ा यह मामला अब केवल प्रशासनिक विवाद नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं और सदियों पुरानी परंपराओं का प्रश्न बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है कि धार्मिक संस्थानों में सुधार की सीमा क्या होनी चाहिए और परंपराओं की पवित्रता को किस प्रकार सुरक्षित रखा जाए। देशभर के श्रद्धालुओं की निगाहें अब इस महत्वपूर्ण फैसले पर टिकी हुई हैं।