नई दिल्ली. भारत में मानसून के बदलते स्वरूप को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता लगातार बढ़ रही है। आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन के अनुसार आने वाले दशकों में मानसूनी बारिश का वितरण अधिक असमान हो सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि पूरे मानसून में लगातार अधिक बारिश होगी, बल्कि कुल वर्षा का बड़ा हिस्सा कुछ सीमित दिनों में अत्यधिक तीव्र बारिश के रूप में दर्ज हो सकता है। ऐसे हालात में सामान्य बारिश के लंबे दौर कम हो सकते हैं और अचानक होने वाली मूसलाधार वर्षा की घटनाएं बढ़ सकती हैं। यह बदलाव शहरों, गांवों, कृषि क्षेत्रों और नदी तंत्र के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकता है, क्योंकि कम समय में भारी मात्रा में पानी गिरने से जल निकासी और आपदा प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्थाओं पर भारी दबाव पड़ सकता है।
13 वैश्विक जलवायु मॉडलों से तैयार हुआ आकलन
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 13 वैश्विक जलवायु मॉडलों के साथ एक उन्नत सांख्यिकीय तकनीक का उपयोग किया। इस पद्धति की विशेषता यह रही कि वर्षा और तापमान के अनुमानों को अलग-अलग देखने के बजाय उनके आपसी संबंध को भी संरक्षित रखने का प्रयास किया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए केवल बारिश या तापमान के आंकड़ों को अलग-अलग सुधारना पर्याप्त नहीं है। मानसून के दौरान तापमान, नमी, बादल और वर्षा की तीव्रता एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इसलिए इन संबंधों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया आकलन भविष्य के जोखिमों को अधिक व्यावहारिक तरीके से समझने में मदद कर सकता है।
2100 तक और उग्र हो सकती है अत्यधिक वर्षा
शोध के निष्कर्षों के अनुसार इस सदी के दौरान भारत में कुल मानसूनी वर्षा का बड़ा हिस्सा अत्यधिक बारिश वाले दिनों में केंद्रित होने की संभावना है। यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन ऊंचे स्तर पर बना रहा तो पश्चिमी, मध्य और पूर्वी भारत के बड़े हिस्सों में यह बदलाव अधिक स्पष्ट हो सकता है। अनुमान के अनुसार 1985-2014 की तुलना में 2100 तक अत्यधिक बारिश वाले दिनों का कुल मानसूनी वर्षा में योगदान 25% से बढ़कर 40% से भी अधिक हो सकता है। अध्ययन में 2021-2050 की अवधि के लिए भी इस प्रवृत्ति के संकेत बताए गए हैं, जबकि सदी के दूसरे हिस्से में इसके और तेज होने की आशंका जताई गई है। इसका सीधा अर्थ है कि भविष्य में मानसून का औसत आंकड़ा सामान्य दिखने के बावजूद जमीन पर उसका असर कहीं अधिक गंभीर हो सकता है।
बाढ़, जलभराव और नदियों के उफान का बढ़ेगा खतरा
कम समय में अत्यधिक बारिश होने की स्थिति में सबसे पहले शहरी ढांचे पर दबाव बढ़ सकता है। कई शहरों की जल निकासी व्यवस्था सामान्य वर्षा के औसत को ध्यान में रखकर तैयार की गई है, लेकिन कुछ घंटों में होने वाली भारी बारिश इन व्यवस्थाओं को पूरी तरह प्रभावित कर सकती है। नालों के उफान, सड़कों पर जलभराव और निचले इलाकों में बाढ़ जैसी स्थितियां अधिक तेजी से पैदा हो सकती हैं। इसी तरह नदियों और छोटे जलग्रहण क्षेत्रों में जलस्तर अचानक बढ़ने का खतरा रहेगा। इससे प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के पास चेतावनी जारी करने तथा लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के लिए पहले की तुलना में कम समय मिल सकता है।
किसानों के लिए भी बदल जाएगी खेती की चुनौती
मानसून का यह बदलता पैटर्न कृषि क्षेत्र के लिए भी गंभीर चुनौती बन सकता है। खेती केवल कुल बारिश की मात्रा पर निर्भर नहीं करती, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होता है कि बारिश कब और कितनी अवधि में होती है। यदि कुछ दिनों में बहुत अधिक वर्षा हो जाए और उसके बाद लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनी रहे, तो फसलों को नुकसान पहुंच सकता है। तेज बारिश से खेतों में पानी भरने, मिट्टी के कटाव और पोषक तत्वों के बहने की समस्या बढ़ सकती है। दूसरी ओर, बारिश के लंबे अंतराल से मिट्टी में नमी की कमी पैदा हो सकती है। ऐसे में भविष्य की कृषि योजना को केवल मानसून की कुल वर्षा के बजाय बारिश के वितरण और उसकी तीव्रता को ध्यान में रखकर तैयार करना होगा।
रातें भी तेजी से गर्म होने का संकेत
अध्ययन में तापमान के बदलते स्वरूप पर भी महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए हैं। कई क्षेत्रों, विशेषकर उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत में दिन के अधिकतम तापमान की तुलना में रात के न्यूनतम तापमान में अपेक्षाकृत तेज वृद्धि का संकेत मिला है। यह स्थिति गर्मी के प्रभाव को और गंभीर बना सकती है, क्योंकि रात के समय तापमान में पर्याप्त कमी नहीं होने से लोगों, फसलों और ऊर्जा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। शोधकर्ताओं ने इस प्रवृत्ति को लंबे समय तक रहने वाली धुंध और एरोसोल प्रदूषण जैसे कारकों से भी जोड़ा है, जो वातावरण में गर्मी के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
नए सिरे से तैयार करनी होगी आपदा और बुनियादी ढांचे की रणनीति
जलवायु परिवर्तन के इस संभावित परिदृश्य से स्पष्ट है कि भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए केवल औसत मानसून आंकड़ों पर आधारित योजना पर्याप्त नहीं होगी। शहरों के ड्रेनेज सिस्टम, बांध और जलाशय प्रबंधन, बाढ़ पूर्वानुमान, सूखा निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों की नए सिरे से समीक्षा करनी पड़ सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि समान वार्षिक वर्षा कम दिनों और अत्यधिक तीव्र बारिश के रूप में दर्ज होने लगी तो मौजूदा बुनियादी ढांचा कई क्षेत्रों में अपर्याप्त साबित हो सकता है। ऐसे में भविष्य की तैयारी का आधार अधिक सटीक जलवायु पूर्वानुमान, स्थानीय स्तर पर जोखिम आकलन और बदलते मौसम पैटर्न के अनुरूप दीर्घकालिक योजना होना चाहिए।
औसत बारिश नहीं, चरम मौसम बनेगा सबसे बड़ी चुनौती
भारत के सामने आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती केवल यह नहीं होगी कि मानसून में कितनी बारिश हुई, बल्कि यह होगी कि बारिश किस समय, कितनी तेजी और कितनी तीव्रता से हुई। जलवायु के बदलते स्वरूप से बाढ़ और सूखे जैसी विपरीत परिस्थितियां एक ही क्षेत्र में अलग-अलग समय पर देखने को मिल सकती हैं। इसलिए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने और उनसे निपटने के लिए सरकारों, वैज्ञानिक संस्थानों, किसानों, नगर नियोजकों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को साझा रणनीति अपनानी होगी। मानसून का भविष्य अधिक अनिश्चित और उग्र हो सकता है, ऐसे में समय रहते तैयारी ही संभावित नुकसान को कम करने का सबसे प्रभावी रास्ता होगी।