नई दिल्ली: राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो छंदों के गायन को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) के फैसले पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की तीखी प्रतिक्रिया के बाद राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भाजपा पर पलटवार किया है। सिब्बल ने सवाल उठाया कि यदि केवल शुरुआती दो छंद गाना ‘देशविरोधी’ है, तो क्या नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान या अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते भाजपा के कार्यक्रमों में पूरा ‘वंदे मातरम’ गाया जाता था?

मोदी और वाजपेयी को लेकर शाह से सीधा सवाल
सिब्बल ने सोशल मीडिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए अमित शाह के बयान पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि क्या 1950 के बाद भाजपा के आधिकारिक या निजी कार्यक्रमों में हमेशा ‘वंदे मातरम’ के सभी छह छंद गाए गए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यदि कांग्रेस का शुरुआती दो छंदों को अपनाने का फैसला देशविरोधी माना जा रहा है, तो इसी कसौटी से भाजपा के पुराने कार्यक्रमों को भी देखा जाना चाहिए।
संविधान सभा और गांधी का भी किया जिक्र
सिब्बल ने 1937 में कांग्रेस द्वारा ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती हिस्से को स्वीकार किए जाने का संदर्भ देते हुए कहा कि उस दौर के कई प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं और बाद में संविधान सभा ने भी इसी स्वरूप को मान्यता दी थी। उन्होंने भाजपा के तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर दो छंदों को स्वीकार करना देशविरोधी है, तो क्या उस समय के राष्ट्रवादी नेता और संविधान सभा भी इसी श्रेणी में आएंगे? सिब्बल ने RSS को लेकर भी सवाल किया कि उसकी शाखाओं और आधिकारिक कार्यक्रमों में क्या हमेशा पूरा ‘वंदे मातरम’ गाया जाता है।
अमित शाह ने कांग्रेस पर लगाया था तुष्टिकरण का आरोप
इससे पहले अमित शाह ने कांग्रेस के फैसले की आलोचना करते हुए आरोप लगाया था कि 1937 में पार्टी ने तुष्टिकरण की राजनीति के कारण ‘वंदे मातरम’ के मूल स्वरूप को सीमित किया था। शाह ने कहा था कि गीत की 150वीं वर्षगांठ के दौरान इसके पूरे स्वरूप को सम्मान देने के बजाय केवल शुरुआती दो छंदों तक सीमित रहना स्वतंत्रता संग्राम और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की विरासत का अपमान है।
जयराम रमेश ने भी भाजपा पर साधा निशाना
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी भाजपा के आरोपों का जवाब देते हुए उसके नेताओं पर ‘नकली राष्ट्रवाद’ का सहारा लेने का आरोप लगाया। उनका तर्क है कि 1937 में शुरुआती दो छंदों को अपनाने का फैसला देश की विविधता और सामाजिक एकता को ध्यान में रखकर लिया गया था। फिलहाल ‘वंदे मातरम’ के पूर्ण या शुरुआती छंदों के गायन को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज होती जा रही है।