ओस्लो/नई दिल्ली: नॉर्वे के एक शीर्ष समाचार पत्र द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'सपेरा' (Snake Charmer) के रूप में दिखाने वाला एक विवादित कार्टून प्रकाशित करने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस कार्टून को लेकर नॉर्वे के प्रमुख अखबार 'आफ़्टेनपोस्टन' (Aftenposten) पर नस्लवाद (Racism), औपनिवेशिक मानसिकता और भारत को अपमानित करने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। नॉर्वे दौरे के समय एक पत्रकार के सवाल को लेकर उपजे कूटनीतिक तनाव के बीच इस कार्टून के सामने आने से विवाद और ज्यादा गहरा गया है।
बुधवार को प्रकाशित इस कार्टून में प्रधानमंत्री मोदी को अपने हाथ में एक पेट्रोल स्टेशन का पाइप थामे हुए दिखाया गया है, जो किसी सांप की तरह नाच रहा है। इसके साथ ही अखबार में एक ओपिनियन (मंच) लेख भी छपा है, जिसका शीर्षक है— "A clever and slightly annoying man" (एक चतुर और थोड़ा परेशान करने वाला व्यक्ति)।
पत्रकार हेगे लैंग के सवाल से शुरू हुआ था विवाद
इस पूरे विवाद की जड़ें नॉर्वे की पत्रकार हेगे लैंग (Hege Lyng) के एक तीखे सवाल से जुड़ी हैं। नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गाहर स्टोर (Jonas Gahr Støre) के साथ एक संयुक्त उपस्थिति के दौरान, पत्रकार ने पीएम मोदी से पूछा था कि "वह विदेशी दौरों के दौरान पत्रकारों के सवालों के जवाब क्यों नहीं देते?"
इस सवाल पर पीएम मोदी ने तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी, लेकिन बाद में भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। भारतीय राजनयिक सिबी जॉर्ज ने भी उक्त पत्रकार के रुख और लहजे का कड़ा विरोध किया था।
भारतीयों का फूटा गुस्सा: 'सपेरों का देश' दिखाने की कोशिश
इस कार्टून के सोशल मीडिया पर वायरल होते ही भारत और विदेशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय नागरिकों (NRIs) का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। लोगों का आरोप है कि इस तरह के रेखाचित्र केवल प्रधानमंत्री का नहीं, बल्कि पूरे भारत और उसकी संस्कृति का अपमान हैं।
आलोचकों का कहना है कि नॉर्वे के मीडिया ने औपनिवेशिक काल (Colonial Era) की रूढ़िवादिता (Stereotype) को जानबूझकर दोबारा हवा दी है, जिसके तहत भारत को हमेशा 'सपेरों और जादूगरों का देश' कहकर नीचा दिखाया जाता था। यह अभिव्यक्ति की आजादी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से बेहद अपमानजनक और नस्लवादी कृत्य है।
क्या कूटनीतिक संबंधों पर पड़ेगा असर?
अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि पश्चिमी मीडिया में राजनीतिक व्यंग्यचित्र (Satirical Caricatures) बनाने की पुरानी परंपरा रही है, लेकिन जब इसमें नस्लीय और राष्ट्रीय अस्मिता को ठेस पहुंचाई जाती है, तो यह स्वीकार्य नहीं होता। पत्रकार के सवाल से उपजे विवाद का बदला लेने के लिए ऐसा कार्टून बनाना नॉर्वे के मीडिया के एजेंडे को दिखाता है।
हालांकि, नॉर्वे के इस अखबार ने अभी तक इस विवाद पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या माफीनामा जारी नहीं किया है। लेकिन इस घटना ने यह बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या प्रेस की स्वतंत्रता के नाम पर किसी संप्रभु राष्ट्र और उसके नेता के खिलाफ नस्लवादी टिप्पणी की जा सकती है? यह विवाद आने वाले दिनों में भारत और नॉर्वे के कूटनीतिक संबंधों में खटास पैदा कर सकता है।