नई दिल्ली. देश में मतदान को अनिवार्य बनाने की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई से इनकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि यह विषय नीतिगत निर्णय के अंतर्गत आता है और इसमें न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती। इस निर्णय के साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया कि मतदान न करने पर किसी नागरिक के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
पीठ की टिप्पणी और याचिकाकर्ता को निर्देश
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में गठित पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली शामिल थे, ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि वह अपनी मांगों को संबंधित सरकारी और विधायी मंचों के समक्ष प्रस्तुत करें। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे विषयों पर निर्णय लेना संसद और कार्यपालिका का अधिकार क्षेत्र है।
दंडात्मक प्रावधानों पर न्यायालय की असहमति
याचिका में यह मांग की गई थी कि जो लोग जानबूझकर मतदान नहीं करते, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए और उन्हें सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जाए। न्यायालय ने इस पर असहमति जताते हुए कहा कि मतदान को बाध्यकारी बनाना लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। यह नागरिक का अधिकार है, जिसे उसकी स्वतंत्रता के साथ ही देखा जाना चाहिए।
लोकतंत्र में जागरूकता की अहम भूमिका
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि लोकतंत्र कानून के दबाव से नहीं, बल्कि जन जागरूकता से मजबूत होता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि नागरिकों को स्वेच्छा से मतदान के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। यदि कोई मतदान नहीं करता, तो उसका समाधान दंड देना नहीं, बल्कि जागरूकता बढ़ाना है।
व्यावहारिक कठिनाइयों का उल्लेख
न्यायालय ने यह भी कहा कि अनिवार्य मतदान लागू करने में कई व्यावहारिक कठिनाइयाँ हैं। कई लोग चुनाव के दिन अपने कार्यों में व्यस्त रहते हैं, जिनमें प्रशासनिक और न्यायिक जिम्मेदारियाँ निभाने वाले लोग भी शामिल हैं। ऐसी स्थिति में सभी को मतदान के लिए बाध्य करना व्यवहारिक नहीं है।
वंचित वर्गों की स्थिति पर चिंता
पीठ ने समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की। दैनिक मजदूरी करने वाले लोगों के लिए मतदान के दिन काम छोड़ना हमेशा संभव नहीं होता। उनके लिए जीविका प्राथमिक होती है, इसलिए उन्हें मतदान न करने के कारण दंडित करना उचित नहीं माना जा सकता।
अधिकार और स्वतंत्रता का संतुलन
इस निर्णय के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में अधिकारों के साथ स्वतंत्रता का संतुलन आवश्यक है। मतदान एक महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन इसे बाध्यता में बदलना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत होगा। जागरूकता और सहभागिता के माध्यम से ही लोकतंत्र को सशक्त बनाया जा सकता है।