आज चाय की दुकान से लेकर रेलवे टिकट और डिजिटल भुगतान तक हर जगह रुपये के साथ ‘₹’ चिह्न दिखाई देता है। लेकिन यह पहचान हमेशा से भारतीय मुद्रा का हिस्सा नहीं थी। लंबे समय तक रुपये की राशि लिखने के लिए ‘Rs’ या ‘Re’ जैसे संक्षिप्त रूप इस्तेमाल किए जाते थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर, पाउंड, यूरो और येन जैसी मुद्राओं के अपने विशिष्ट प्रतीक थे, ऐसे में भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए भी एक अलग दृश्य पहचान की जरूरत महसूस होने लगी।
2009 में शुरू हुई डिजाइन प्रतियोगिता
भारतीय रुपये के लिए एक विशिष्ट प्रतीक तैयार करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने 2009 में राष्ट्रीय स्तर की डिजाइन प्रतियोगिता आयोजित की। इस प्रतियोगिता में देशभर से करीब 3,000 डिजाइन प्रविष्टियां प्राप्त हुईं। इनमें कई तरह की रचनात्मक अवधारणाएं शामिल थीं, लेकिन एक डिजाइन ने निर्णायकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। यह डिजाइन तमिलनाडु के तत्कालीन विलुप्पुरम जिले के निवासी डी. उदय कुमार ने तैयार किया था।
कौन हैं डी. उदय कुमार?
डी. उदय कुमार पेशे से वास्तुकार हैं और उस समय भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई में पीएचडी कर रहे थे। डिजाइन और दृश्य संचार के क्षेत्र में उनकी समझ ने रुपये के प्रतीक को एक अलग स्वरूप देने में मदद की। उनका उद्देश्य ऐसा चिह्न तैयार करना था, जिसमें भारतीय सांस्कृतिक पहचान की झलक होने के साथ-साथ आधुनिकता और सरलता भी दिखाई दे। यही विशेषता उनके डिजाइन को अन्य प्रस्तावों से अलग बनाती थी।
‘र’ और ‘R’ से तैयार हुआ अनोखा प्रतीक
उदय कुमार ने रुपये के प्रतीक में देवनागरी के अक्षर ‘र’ और रोमन अक्षर ‘R’ की अवधारणा को जोड़ा। डिजाइन को सरल और विशिष्ट रूप देने के लिए रोमन अक्षर की सीधी खड़ी रेखा को हटा दिया गया। प्रतीक के ऊपरी हिस्से में बनी 2 समानांतर रेखाएं इसे अलग पहचान देती हैं। इस तरह डिजाइन में भारतीय लिपि और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले रोमन अक्षर का रचनात्मक मेल दिखाई देता है।
तिरंगे से जुड़ी हैं ऊपरी रेखाएं
रुपये के प्रतीक में बनी 2 समानांतर रेखाओं को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की क्षैतिज पट्टियों से प्रेरित बताया जाता है। इनके माध्यम से राष्ट्रीय पहचान और आर्थिक समानता का भाव भी व्यक्त करने की कोशिश की गई। प्रतीक की संरचना में ऊपर की रेखाएं और नीचे की आकृति मिलकर भारत की मुद्रा को एक ऐसा दृश्य रूप देती हैं, जिसे लिखना और पहचानना दोनों आसान है। यही सादगी इसके व्यापक इस्तेमाल की बड़ी वजह बनी।
जुलाई 2010 में मिली आधिकारिक पहचान
डी. उदय कुमार के डिजाइन को जुलाई 2010 में भारतीय रुपये के आधिकारिक प्रतीक के रूप में चुना गया। इसके बाद धीरे-धीरे इसे बैंकिंग, सरकारी दस्तावेजों, कीमतों, व्यापारिक लेनदेन और डिजिटल माध्यमों में अपनाया जाने लगा। आगे चलकर कंप्यूटर और मोबाइल उपकरणों में भी रुपये के प्रतीक के इस्तेमाल की सुविधा बढ़ी। इस तरह एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में तैयार किया गया डिजाइन कुछ ही वर्षों में भारतीय मुद्रा की स्थायी पहचान बन गया।
आज दुनिया में भारत की आर्थिक पहचान
‘₹’ अब केवल रुपये की कीमत बताने वाला निशान नहीं है, बल्कि भारत की आर्थिक और राष्ट्रीय पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक भी बन चुका है। दुकानों के मूल्य-पट्ट से लेकर शेयर बाजार, डिजिटल भुगतान, बैंकिंग सेवाओं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार तक इसका व्यापक इस्तेमाल होता है। एक साधारण से दिखाई देने वाले इस चिह्न में भारतीय लिपि, आधुनिक डिजाइन और राष्ट्रीय पहचान का ऐसा मेल है, जिसने इसे भारतीय मुद्रा की वैश्विक दृश्य पहचान बना दिया है।