कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा में सत्ता परिवर्तन के बाद अब नियमों और अधिकारों को लेकर एक नया कानूनी और राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है। बालीगंज से तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय को टीएमसी संसदीय दल का नेता (नेता प्रतिपक्ष/विरोधी दल नेता) चुना गया है। लेकिन विधानसभा में उन्हें बैठने के लिए कमरा (विरोधी दल नेता का कमरा) अलॉट किए जाने को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सोमवार को भी विधानसभा में विरोधी दल के नेता के कमरे पर ताला लटका रहा। इस पूरे विवाद के केंद्र में टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी का एक पत्र है, जिसे विधानसभा सचिवालय ने पूरी तरह खारिज कर दिया है।
सांसद अभिषेक बनर्जी के अधिकार क्षेत्र पर उठा सवाल
विधानसभा सचिवालय के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद टीएमसी की ओर से जो आधिकारिक पत्र विधानसभा सचिवालय को भेजा गया था, उस पर अभिषेक बनर्जी के हस्ताक्षर (साइन) थे। सचिवालय ने इसी पर गंभीर आपत्ति जताई है।
विधानसभा के नियमों (रूल बुक) के मुताबिक, संसदीय दल या विधायक दल से जुड़ा कोई भी पत्र या दावा पेश करने का अधिकार केवल उसी दल के विधायकों (MLAs) को होता है। चूंकि अभिषेक बनर्जी लोकसभा के सांसद हैं और विधानसभा के सदस्य नहीं हैं, इसलिए उनके पत्र की कोई कानूनी वैधता नहीं है। सचिवालय का साफ कहना है कि जो व्यक्ति विधानसभा का सदस्य ही नहीं है, उसके पत्र के आधार पर विपक्ष के नेता का कमरा या अन्य सरकारी सुविधाएं आवंटित नहीं की जा सकतीं।
सड़क पर बैठ जाऊंगा, लेकिन गुहार नहीं लगाऊंगा: शोभनदेव
सचिवालय द्वारा पत्र खारिज किए जाने और कमरा न मिलने की सूचना के बाद प्रबीन नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने इसके विरोध में तुरंत सूचना का अधिकार (RTI) के तहत एक आवेदन दाखिल कर दिया।
भावुक और आक्रोशित होते हुए शोभनदेव ने कहा, "अतीत में जब बिमान बनर्जी अध्यक्ष (स्पीकर) थे, तब ऐसा कभी नहीं हुआ। एक समय था जब विधानसभा में टीएमसी का एकमात्र विधायक मैं था। तब मैंने सड़कों पर उतरकर पार्टी के लिए लड़ाई लड़ी है। अगर जरूरत पड़ी तो मैं इस बार भी सड़क पर बैठकर अपना काम करूंगा, लेकिन किसी के सामने हाथ फैलाने या आवेदन-निवेदन करने नहीं जाऊंगा। यह सरासर अन्याय है।" सोमवार को उन्होंने कमरा न मिलने के कारण विधानसभा के एक अन्य सामान्य कमरे में कुणाल घोष और नयना बनर्जी जैसे नेताओं के साथ बैठकर काम निपटाया।
टीएमसी के पुराने ढर्रे पर सचिवालय का 'नियमों' से पलटवार
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा के रुल बुक को लेकर जारी यह खींचतान असल में टीएमसी शासनकाल के दौरान बोए गए कांटों का ही परिणाम है। साल 2016 के बाद जब टीएमसी सत्ता में थी, तब मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को मौका न देकर तत्कालीन स्पीकर के जरिए पीएसी (PAC) चेयरमैन का पद अपनी मर्जी से बांटा गया था। पहले मानस भुइयां, फिर शंकर सिंह और बाद में कागजों पर बीजेपी विधायक रहे मुकुल रॉय को उस पद पर बैठाया गया था। तब बिमान बनर्जी ने रुल बुक का हवाला देकर उसे सही ठहराया था। आज उसी रुल बुक का हवाला देकर सचिवालय टीएमसी को उसकी पुरानी नीतियां याद दिला रहा है। सचिवालय ने साफ कर दिया है कि किसी भी रसूखदार के कहने पर विधानसभा के नियम नहीं तोड़े जाएंगे।