कोलकाता: कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला स्वास्थ्य और आयु के मानकों पर पात्र है, तो केवल पति की अधिक उम्र के आधार पर उसे IVF उपचार से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने 49 वर्षीय महिला को IVF सुविधा उपलब्ध कराने का निर्देश देते हुए मातृत्व के अधिकार को सर्वोपरि बताया।
मातृत्व के अधिकार पर हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
कोलकाता से आए इस महत्वपूर्ण फैसले में कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि मातृत्व का अधिकार महिला का व्यक्तिगत और संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने माना कि IVF प्रक्रिया में गर्भ धारण करने और बच्चे को जन्म देने की जिम्मेदारी महिला निभाती है, इसलिए पति की आयु को आधार बनाकर उपचार से इनकार करना उचित नहीं है।
पति की उम्र बनी थी इलाज में रुकावट
मामले में दंपती कई वर्षों से संतान प्राप्ति का प्रयास कर रहा था और सहायक प्रजनन तकनीक (ART) के माध्यम से IVF उपचार कराना चाहता था। अस्पताल ने पति की उम्र निर्धारित सीमा से अधिक होने का हवाला देकर इलाज से मना कर दिया था। इसके बाद मामला अदालत पहुंचा।
अदालत ने कानून की मंशा स्पष्ट की
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ART कानून का उद्देश्य तकनीक के दुरुपयोग को रोकना है, न कि योग्य महिलाओं को मातृत्व से वंचित करना। यदि महिला निर्धारित आयु सीमा के भीतर है और चिकित्सकीय रूप से गर्भधारण करने में सक्षम है, तो उसे उपचार का अवसर मिलना चाहिए।
49 वर्षीय महिला को IVF उपचार देने का निर्देश
अदालत ने संबंधित अस्पताल को निर्देश दिया कि वह कानून के प्रावधानों का पालन करते हुए 49 वर्षीय महिला को IVF उपचार उपलब्ध कराए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में महिला के अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।