कोलकाता ब्यूरो : कंक्रीट के जंगलों से घिरी कोलकाता नगरी के सबसे प्रमुख फेफड़ों में से एक, दक्षिण कोलकाता का 'रवींद्र सरोवर' (ढाकुरिया लेक) अब एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ रहा है। अपनी खुली हवा, मानसिक शांति और कसरत के लिए हर दिन सुबह से रात तक हजारों लोगों की मेजबानी करने वाले इस बेहद लोकप्रिय लेक में अब एंट्री फीस (प्रवेश शुल्क) लगाने की तैयारी चल रही है।
राज्य के शहरी विकास विभाग और कोलकाता मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी (KMDA) सरोवर परिसर में आम दर्शकों के लिए प्रवेश मूल्य निर्धारित करने के एक प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। जैसे ही यह खबर सार्वजनिक हुई, पूरे कोलकाता शहर में इस फैसले के खिलाफ तीखी बहस और विवाद शुरू हो गया है।
क्या है KMDA का नया प्लान?
केएमडीए की योजना के मुताबिक, मुख्य रूप से सुबह के मॉर्निंग वॉकर्स का समय खत्म होने के बाद (यानी सुबह 8 बजे या 10 बजे के बाद) आने वाले आम दर्शकों को टिकट खरीदकर ही सरोवर में प्रवेश मिलेगा। हालांकि, नियमित रूप से सुबह और शाम को टहलने आने वाले नागरिकों को इस शुल्क से राहत दी जाएगी और उनके लिए एक विशेष पास (Special Pass) की व्यवस्था करने पर विचार किया जा रहा है।
प्रशासन ने दी ये दलीलें
इस संभावित फैसले के पीछे प्रशासन ने कई मुख्य वजहें बताई हैं: रखरखाव और सौंदर्यीकरण: हाल ही में राज्य की शहरी विकास मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने रवींद्र सरोवर का निरीक्षण किया था, जहां लेक के पानी को साफ रखने और सौंदर्यीकरण पर जोर दिया गया। प्रशासन का मानना है कि टिकट से मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल इसके रखरखाव में किया जाएगा।
भीड़ और प्रदूषण पर नियंत्रण: प्रशासन का दावा है कि एंट्री फीस लगाने से बेवजह की भीड़ कम होगी, असामाजिक गतिविधियों पर रोक लगेगी और पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
अदालत का निर्देश: साल 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने सरोवर के पर्यावरण की रक्षा के लिए यहां धार्मिक आयोजनों पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ प्रवेश शुल्क शुरू करने का निर्देश दिया था। इतने सालों बाद केएमडीए अब उस निर्देश को लागू करने के लिए सक्रिय हुआ है।सॉल्ट लेक का उदाहरण: अधिकारियों का तर्क है कि सॉल्ट लेक के 'बनबितान' (सेंट्रल पार्क) में यह व्यवस्था सफलतापूर्वक चल रही है।
भड़के आम नागरिक, जताई कड़ी आपत्ति
प्रशासन के इन तर्कों को सरोवर के नियमित दर्शकों और स्थानीय निवासियों ने सिरे से खारिज कर दिया है। रिटायर्ड बुजुर्गों से लेकर आईटी सेक्टर के युवाओं तक, सभी का एक ही सुर है। नाराज नागरिकों का कहना है कि शहर की खुली और साफ हवा इंसानों का बुनियादी अधिकार है, उस पर टिकट की दीवार खड़ी करना बेहद भेदभावपूर्ण है।
लोगों का कहना है कि अगर प्रतिदिन 10 रुपये का भी टिकट लगा, तो मध्यमवर्ग और गरीब लोगों की जेब पर इसका भारी असर पड़ेगा। कई दिहाड़ी मजदूर और कम आय वाले लोग इस लेक के रास्ते से होकर आते-जाते हैं या दोपहर में थोड़ा सुस्ता लेते हैं। टिकट लागू होने पर ये हाशिए के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। नागरिकों का साफ कहना है कि यह फंड की कमी नहीं, बल्कि खराब प्रबंधन का नतीजा है; प्रकृति का व्यवसायीकरण नहीं किया जाना चाहिए।
पर्यावरणविद और पक्षी प्रेमी भी चिंता में
इस प्रस्ताव से कोलकाता के पक्षी प्रेमियों और पर्यावरणविदों के संगठन 'बायोडायवर्सिटी ऑफ रवींद्र सरोवर' के सदस्य सबसे ज्यादा चिंतित हैं। ढाकुरिया लेक केवल इंसानों के अड्डेबाज़ी की जगह नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspot) है, जहां कई प्रवासी पक्षी आते हैं।
शोधकर्ताओं का दावा है कि सुबह 10 बजे के बाद जब मॉर्निंग वॉकर्स चले जाते हैं, तब शांत माहौल में पक्षियों को निहारने और उन पर शोध करने का असली समय शुरू होता है। अगर प्रवेश शुल्क लागू हुआ, तो स्कूल-कॉलेज के छात्र और युवा शोधकर्ता यहां आना बंद कर देंगे। उन्होंने सॉल्ट लेक के बनबितान का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां टिकट लागू होने के बाद बर्ड-वॉचिंग करने वाले लोग कम हो गए हैं। इसके अलावा, कैमरा इस्तेमाल करने पर अतिरिक्त शुल्क (कैमरा चार्ज) लगने का डर भी उन्हें सता रहा है। इस संबंध में वे जल्द ही शहरी विकास मंत्री से मुलाकात करने वाले हैं।