साल 2026 और 2027 को लेकर मौसम वैज्ञानिकों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन यानी NOAA के जलवायु पूर्वानुमान केंद्र ने अपने नए आकलन में संकेत दिए हैं कि अक्टूबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच ‘सुपर अलनीनो’ विकसित होने की सबसे अधिक संभावना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह स्थिति बनी, तो दुनिया को भीषण गर्मी, कमजोर मानसून, सूखा, अचानक बाढ़ और फसलों के बड़े नुकसान जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
क्या होता है अलनीनो और क्यों बढ़ती है चिंता?
अलनीनो ENSO यानी अलनीनो-दक्षिणी दोलन जलवायु चक्र का गर्म चरण माना जाता है। यह स्थिति तब बनती है जब उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर का समुद्री तापमान सामान्य से काफी अधिक बढ़ जाता है। इसका असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया के मौसम चक्र को प्रभावित करता है। वैज्ञानिकों के अनुसार अलनीनो वैश्विक तापमान को तेजी से बढ़ा देता है, जिससे बारिश का पैटर्न बदल जाता है और कई क्षेत्रों में प्राकृतिक असंतुलन पैदा हो जाता है।
भारत में कमजोर मानसून और भीषण गर्मी की आशंका
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD पहले ही संकेत दे चुका है कि अलनीनो की सक्रियता भारत में मानसूनी बारिश को कमजोर कर सकती है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सुपर अलनीनो की स्थिति बनी रहती है तो देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश दर्ज हो सकती है। इससे खेती, जलाशयों और पेयजल व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है। दूसरी ओर उत्तर और मध्य भारत में तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है, जिससे Heatwave की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
कहीं सूखा तो कहीं विनाशकारी बाढ़ का खतरा
वैज्ञानिकों का मानना है कि सुपर अलनीनो का असर हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं होता। जहां कुछ इलाकों में बारिश बेहद कम होकर सूखे जैसे हालात पैदा करती है, वहीं कई क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। दक्षिण एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में कृषि और खाद्य सुरक्षा पर इसका सबसे अधिक असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार मौसम का यह असंतुलन वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा दबाव बना सकता है।
इतिहास का सबसे विनाशकारी अलनीनो बना चेतावनी
वैज्ञानिकों ने 1877 के विनाशकारी अलनीनो का उदाहरण देते हुए चेतावनी दी है कि सुपर अलनीनो बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। वर्ष 1876 से 1878 के बीच आए शक्तिशाली अलनीनो के कारण दुनिया के कई हिस्सों में भयंकर अकाल पड़ा था। ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार उस दौरान करीब 5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। इसे मानव इतिहास की सबसे भयावह जलवायु आपदाओं में गिना जाता है।
कृषि और खाद्य सुरक्षा पर गहराता संकट
विशेषज्ञों के अनुसार अलनीनो का सबसे बड़ा असर कृषि उत्पादन पर पड़ता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देशों में कमजोर मानसून का मतलब सीधे तौर पर फसल उत्पादन में गिरावट हो सकता है। यदि बारिश कम हुई तो धान, दाल, तिलहन और गन्ने जैसी प्रमुख फसलें प्रभावित हो सकती हैं। इससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि और महंगाई बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
IMD और वैज्ञानिक एजेंसियों की बढ़ी निगरानी
सुपर अलनीनो की संभावनाओं को देखते हुए IMD और अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों ने निगरानी बढ़ा दी है। समुद्री तापमान, वायुमंडलीय दबाव और हवाओं के पैटर्न पर लगातार नजर रखी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले महीनों में मौसम की गतिविधियां यह तय करेंगी कि अलनीनो कितना शक्तिशाली रूप लेता है और उसका असर किन क्षेत्रों में सबसे अधिक देखने को मिलेगा।