इंदौर: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच को सौंपी गई 600 पन्नों की न्यायिक जांच रिपोर्ट में इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से हुई मौतों के मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता वाले एक सदस्यीय आयोग की जांच रिपोर्ट के अनुसार, पीने के पानी में सीवर का गंदा पानी मिलने के कारण 24 लोगों की मौत हुई थी। आयोग ने कुल 36 मौतों की जांच की थी, जिनमें से 24 मामलों में मौतों की सीधी वजह दूषित पानी का सेवन पाई गई।
प्रशासनिक लापरवाही और टेंडर प्रक्रिया में देरी बनी वजह
जांच रिपोर्ट में प्रशासनिक ढिलाई और पाइपलाइन बदलने की सुस्त प्रक्रिया को इस भीषण त्रासदी की मुख्य वजह बताया गया है। भागीरथपुरा इलाके में पुरानी और जर्जर पानी की पाइपलाइन को बदलने के साथ-साथ नर्मदा जल आपूर्ति लाइन के लिए टेंडर प्रक्रिया लंबे समय तक लटकी रही। वकीलों और याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यदि इंदौर नगर निगम (IMC) के अधिकारियों द्वारा समय रहते टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ली जाती और जर्जर पाइपलाइनों को बदला जाता, तो सीवर का पानी पेयजल लाइन में नहीं मिलता और इस भीषण संकट को टाला जा सकता था।
8 से 10 अधिकारी पाए गए दोषी, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर सवाल
रिपोर्ट के प्रमुख अंशों का निरीक्षण करने वाले वकीलों ने बताया कि आयोग ने इंदौर नगर निगम के लगभग 8 से 10 इंजीनियरों और जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों को उनके गैर-जिम्मेदार रवैये और लापरवाही के लिए दोषी ठहराया है। हालांकि, रिपोर्ट में कुछ वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों और चुने हुए जनप्रतिनिधियों को इस मामले में क्लीन चिट मिलने की बात भी सामने आ रही है। इस पर राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है। मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता उमंग सिंघार ने सवाल उठाया है कि केवल निचले अफसरों पर ही गाज क्यों गिराई जा रही है, जबकि जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों की भी इस गंभीर घटना में बराबर की जवाबदेही बनती है।
मुआवजा बढ़ाने और बुनियादी सुधारों की सिफारिश
पीड़ितों की ओर से पैरवी कर रहे एडवोकेट मनीष यादव ने बताया कि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में प्रभावित परिवारों के लिए मुआवजे की राशि बढ़ाने की स्पष्ट सिफारिश की है। इसके साथ ही भविष्य में इंदौर और राज्य के अन्य शहरों में सीवर और पीने के पानी की लाइनों के आपस में मिलने की घटनाओं को पूरी तरह रोकने के लिए कई कड़े इंफ्रास्ट्रक्चरल सुझाव दिए गए हैं।
रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग तेज
रिपोर्ट को औपचारिक रूप से हाई कोर्ट की रजिस्ट्री में रखा गया है और फिलहाल इसे आम जनता के लिए पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया गया है। इस बीच कांग्रेस सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों ने रिपोर्ट को तुरंत सार्वजनिक करने और जिम्मेदार अधिकारियों के साथ-साथ दोषी जनप्रतिनिधियों पर भी सख्त कार्रवाई करने की मांग की है। हाई कोर्ट द्वारा इस रिपोर्ट पर जल्द ही अगली सुनवाई के दौरान विस्तृत आदेश जारी किए जाने की संभावना है।