भारत और रूस के बीच दशकों पुरानी रक्षा साझेदारी एक बार फिर व्यापक चर्चा के केंद्र में है। रॉ फीड में सामने आए संकेतों के अनुसार, दिल्ली में प्रस्तावित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा रक्षा क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण प्रस्तावों को गति दे सकती है। इनमें भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों के बड़े बेड़े का उन्नयन और रूस के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान सुखोई-57 से जुड़ी संभावित पेशकश प्रमुख मानी जा रही है। हालांकि किसी अंतिम समझौते की आधिकारिक पुष्टि को लेकर औपचारिक घोषणा की प्रतीक्षा रहेगी, लेकिन दोनों देशों के बीच तकनीकी सहयोग, उत्पादन साझेदारी और दीर्घकालिक सैन्य क्षमता निर्माण पर चर्चा की संभावना रणनीतिक हलकों का ध्यान आकर्षित कर रही है।
भारत के लिए यह विषय केवल नए लड़ाकू विमान खरीदने तक सीमित नहीं है। आने वाले वर्षों में वायुसेना की स्क्वाड्रन क्षमता, पुराने विमानों के चरणबद्ध हटने और नई पीढ़ी की हवाई युद्ध तकनीकों के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में किसी भी संभावित रक्षा समझौते का मूल्यांकन विमान की संख्या या कीमत से अधिक उसके तकनीकी हस्तांतरण, स्वदेशी उत्पादन, रखरखाव क्षमता और भविष्य में भारतीय उद्योग की भागीदारी के आधार पर किया जाएगा। भारत की दीर्घकालिक रणनीति अब केवल आयातित हथियारों पर निर्भर रहने के बजाय देश के भीतर निर्माण और तकनीकी क्षमता विकसित करने पर अधिक केंद्रित दिखाई देती है।
सौ से अधिक सुखोई-30 एमकेआई को आधुनिक बनाने की संभावनाएं
भारतीय वायुसेना के सबसे महत्वपूर्ण लड़ाकू विमानों में शामिल सुखोई-30 एमकेआई का व्यापक आधुनिकीकरण भविष्य की हवाई शक्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रॉ फीड के अनुसार, 100 से अधिक विमानों को आधुनिक मानकों के अनुरूप विकसित करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। मौजूदा बेड़े ने वर्षों से भारत की हवाई सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और इसकी लंबी दूरी, भारी हथियार ले जाने की क्षमता तथा विविध अभियानों में उपयोगिता इसे विशेष बनाती है। अब बदलते युद्धक्षेत्र, आधुनिक रडार प्रणालियों और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की बढ़ती भूमिका को देखते हुए इन विमानों की तकनीकी क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
प्रस्तावित उन्नयन में आधुनिक एवियोनिक्स, बेहतर रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, नए हथियारों के एकीकरण और अन्य तकनीकी सुधारों को शामिल किए जाने की चर्चा है। इंजन प्रदर्शन, संरचनात्मक आयु और हथियार वहन क्षमता में सुधार से विमान की उपयोगिता आने वाले दशकों तक बढ़ाई जा सकती है। यही कारण है कि इसे केवल मरम्मत या सामान्य उन्नयन नहीं, बल्कि व्यापक क्षमता विस्तार की परियोजना के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय उद्योग और सार्वजनिक क्षेत्र की विमानन निर्माण क्षमता को इस प्रक्रिया से जोड़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि इससे देश के भीतर रखरखाव, उत्पादन और तकनीकी विशेषज्ञता का आधार मजबूत हो सकता है।
‘सुपर सुखोई’ परियोजना से बदल सकती है वायुसेना की क्षमता
सुखोई-30 एमकेआई के आधुनिकीकरण को प्रायः ‘सुपर सुखोई’ अवधारणा के रूप में देखा जाता है। इसका उद्देश्य मौजूदा विमान के मजबूत ढांचे और उड़ान क्षमता को बनाए रखते हुए उसके भीतर ऐसी आधुनिक प्रणालियां शामिल करना है, जो भविष्य के हवाई युद्ध की आवश्यकताओं के अनुरूप हों। रॉ फीड में लगभग 63 हजार करोड़ रुपये की लागत से 84 विमानों को उन्नत करने की योजना का उल्लेख किया गया है। यदि व्यापक स्तर पर इस दिशा में काम आगे बढ़ता है, तो भारतीय वायुसेना को अपेक्षाकृत कम समय में बड़ी संख्या में आधुनिकीकृत लड़ाकू विमान उपलब्ध हो सकते हैं।
इस परियोजना का एक महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय विमान निर्माण उद्योग की भूमिका भी है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की नासिक इकाई पहले से सुखोई-30 एमकेआई कार्यक्रम से जुड़ी रही है और संभावित उन्नयन में उसकी भागीदारी स्वदेशी औद्योगिक क्षमता के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। रूस के साथ सहयोग के बावजूद भारत की कोशिश यह होगी कि अधिकतम संभव प्रणालियां, हथियार और तकनीकी समाधान देश के भीतर विकसित या एकीकृत किए जाएं। इस प्रकार ‘सुपर सुखोई’ केवल पुराने विमानों को नया बनाने की योजना नहीं, बल्कि भारतीय वायु शक्ति और घरेलू रक्षा विनिर्माण को एक साथ आगे बढ़ाने वाला कार्यक्रम बन सकता है।
सुखोई-57 की संभावित पेशकश और तकनीकी हस्तांतरण का सवाल
रॉ फीड में सबसे महत्वपूर्ण दावा रूस द्वारा भारत को सुखोई-57 की संभावित पेशकश से जुड़ा है। यह रूस का पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान है, जिसे कम दृश्यता, उच्च गतिशीलता, आधुनिक सेंसर और उन्नत युद्ध प्रणालियों के साथ विकसित किया गया है। भारत के सामने यदि केवल विमान खरीदने के बजाय संयुक्त उत्पादन और व्यापक तकनीकी हस्तांतरण का प्रस्ताव रखा जाता है, तो उसका रणनीतिक महत्व कहीं अधिक हो सकता है। हालांकि किसी भी संभावित प्रस्ताव की वास्तविक उपयोगिता उसके विस्तृत तकनीकी, वित्तीय, औद्योगिक और परिचालन मूल्यांकन के बाद ही स्पष्ट होगी।
भारत के लिए तकनीकी हस्तांतरण का प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। बीते वर्षों में भारत ने रक्षा क्षेत्र में केवल तैयार प्लेटफॉर्म खरीदने के बजाय डिजाइन, निर्माण, रखरखाव और महत्वपूर्ण उप-प्रणालियों में घरेलू क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया है। इसलिए सुखोई-57 से संबंधित किसी भी संभावित वार्ता में यह देखा जाएगा कि भारत को वास्तव में कितनी तकनीक उपलब्ध होगी और देश की कंपनियों की उत्पादन प्रक्रिया में क्या भूमिका होगी। इंजन, रडार, सेंसर, सामग्री विज्ञान और मिशन प्रणालियों जैसी संवेदनशील तकनीकों तक पहुंच का स्तर किसी भी प्रस्ताव की वास्तविक रणनीतिक उपयोगिता तय कर सकता है।
2032 तक का अंतर और पांचवीं पीढ़ी की चुनौती
भारत का स्वदेशी उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान, अर्थात एएमसीए, भविष्य की भारतीय वायु शक्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। रॉ फीड के अनुसार, इसके सेवा में आने की संभावित समय-सीमा 2032 के आसपास मानी जा रही है। यदि स्वदेशी कार्यक्रम और किसी विदेशी पांचवीं पीढ़ी के विमान की उपलब्धता के बीच समय का अंतर पैदा होता है, तो उस अवधि में वायुसेना की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अंतरिम विकल्पों पर विचार करना स्वाभाविक होगा। यही वह रणनीतिक संदर्भ है जिसमें सुखोई-57 जैसे प्रस्ताव को देखा जा रहा है।
क्षेत्रीय सुरक्षा वातावरण भी इस चर्चा को महत्वपूर्ण बनाता है। चीन पहले से अपनी पांचवीं पीढ़ी की लड़ाकू क्षमताओं का विस्तार कर रहा है और एशिया में उन्नत सैन्य तकनीकों की प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। भारत के लिए चुनौती केवल किसी एक विमान के मुकाबले की नहीं, बल्कि नेटवर्क आधारित युद्ध, लंबी दूरी के सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, मिसाइल प्रणालियों और बहुस्तरीय वायु रक्षा के व्यापक ढांचे की है। इसलिए पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान पर कोई भी निर्णय भारत की समग्र रक्षा योजना, स्वदेशी एएमसीए परियोजना और भविष्य की औद्योगिक नीति के साथ समन्वय में लिया जाना आवश्यक होगा।
2007 की साझेदारी, 2018 का अलगाव और बदला रणनीतिक परिदृश्य
भारत और रूस ने वर्ष 2007 में पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के विकास से संबंधित सहयोग का एक महत्वाकांक्षी रास्ता अपनाया था। बाद के वर्षों में परियोजना की लागत, तकनीकी आवश्यकताओं और भारत की परिचालन अपेक्षाओं से जुड़े मतभेदों के कारण भारत वर्ष 2018 में उस कार्यक्रम से अलग हो गया। उस समय का निर्णय तत्कालीन परिस्थितियों और उपलब्ध तकनीकी आकलन के आधार पर लिया गया था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक सुरक्षा वातावरण, क्षेत्रीय सैन्य संतुलन और भारत की रक्षा विनिर्माण नीति में महत्वपूर्ण बदलाव आया है।
आज की परिस्थितियां पहले से अलग हैं। भारत स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों को आगे बढ़ा रहा है, लेकिन साथ ही तत्काल और मध्यम अवधि की परिचालन आवश्यकताओं को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। रूस भी बदलते रक्षा बाजार और अपनी औद्योगिक साझेदारियों के विस्तार के संदर्भ में भारत के साथ अधिक गहरे सहयोग में रुचि रख सकता है। इसलिए सुखोई-57 से संबंधित संभावित बातचीत को पुराने कार्यक्रम की सीधी पुनरावृत्ति के बजाय नई परिस्थितियों में उभरते रणनीतिक विकल्प के रूप में देखा जा सकता है। अंतिम निर्णय की दिशा, शर्तें और तकनीकी दायरा आधिकारिक वार्ताओं के परिणाम पर निर्भर करेगा।
रफ्तार, स्टेल्थ और आधुनिक युद्ध प्रणालियों का संयोजन
सुखोई-57 को रूस ने आधुनिक हवाई युद्ध की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विकसित किया है। इसमें कम दृश्यता की विशेषताओं के साथ उच्च गतिशीलता, उन्नत सेंसर और बहु-भूमिका अभियानों की क्षमता पर जोर दिया गया है। किसी भी पांचवीं पीढ़ी के विमान की शक्ति केवल उसकी गति या हथियारों में नहीं होती, बल्कि इस बात में भी होती है कि वह विभिन्न सेंसरों से प्राप्त सूचनाओं को किस प्रकार एकीकृत करता है और युद्धक्षेत्र में अन्य प्लेटफॉर्मों के साथ कितना प्रभावी नेटवर्क तैयार कर सकता है।
रॉ फीड में सुखोई-57 की तुलना अमेरिका के एफ-35ए और चीन के जे-20 जैसे विमानों से की गई है। हालांकि अलग-अलग लड़ाकू विमानों की प्रत्यक्ष तुलना हमेशा जटिल होती है, क्योंकि उनकी डिजाइन अवधारणा, मिशन भूमिका, सेंसर प्रणाली और संचालन सिद्धांत अलग-अलग होते हैं। किसी विमान को दूसरे से बेहतर या कमतर बताने के बजाय भारत के लिए मुख्य प्रश्न यह होगा कि वह उसकी विशिष्ट परिचालन आवश्यकताओं में कितना उपयोगी है। भारतीय वायुसेना की भौगोलिक जरूरतें, पर्वतीय सीमाएं, समुद्री क्षेत्र और संभावित बहुस्तरीय संघर्ष का वातावरण किसी भी नए लड़ाकू विमान के मूल्यांकन में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
ब्रिक्स यात्रा से आगे, रक्षा साझेदारी की बड़ी तस्वीर
यदि दिल्ली में प्रस्तावित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भारत और रूस के बीच इन विषयों पर कोई ठोस प्रगति होती है, तो उसका प्रभाव केवल दो रक्षा परियोजनाओं तक सीमित नहीं रहेगा। यह दोनों देशों के बीच बदलती रक्षा साझेदारी की दिशा का संकेत भी हो सकता है। भारत एक ओर अपने स्वदेशी रक्षा उद्योग को मजबूत करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर उसे ऐसी अत्याधुनिक तकनीकों तक पहुंच की आवश्यकता है, जो भविष्य के युद्धक्षेत्र में उसकी क्षमता को बनाए रख सकें। रूस के साथ पुराना सैन्य संबंध इस दिशा में एक आधार प्रदान करता है, लेकिन भविष्य की साझेदारी को नई तकनीकी और औद्योगिक वास्तविकताओं के अनुरूप ढालना होगा।
आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि संभावित वार्ताओं से भारत को कितनी वास्तविक तकनीकी क्षमता, उत्पादन अधिकार और दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ प्राप्त होते हैं। केवल बड़ी संख्या में विमान खरीदना अब पर्याप्त नहीं माना जा सकता। भारत के लिए आदर्श व्यवस्था वही होगी, जिसमें तत्काल वायुसेना की जरूरतें पूरी होने के साथ-साथ एएमसीए जैसे स्वदेशी कार्यक्रमों और देश के रक्षा उद्योग को भी मजबूती मिले। इसलिए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर टिकी निगाहों के बीच सुखोई-30 एमकेआई के आधुनिकीकरण और सुखोई-57 की संभावित पेशकश से जुड़ी चर्चा भारत की भविष्य की हवाई शक्ति के एक बड़े रणनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गई है।