नई दिल्ली. देश में खरीफ कृषि का बड़ा हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर निर्भर रहता है और इस वर्ष बारिश के उतार-चढ़ाव ने किसानों तथा सरकार दोनों की चिंता बढ़ाई है। 1 जून से 19 अगस्त 2026 के बीच देश में औसत से करीब 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज किए जाने की बात सामने आई है। हालांकि हाल के सप्ताहों में कई हिस्सों में अच्छी बारिश होने से स्थिति में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन बारिश का क्षेत्रीय वितरण अभी भी महत्वपूर्ण चुनौती बना हुआ है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कहा है कि फिलहाल देश की समग्र स्थिति संतोषजनक है और खरीफ उत्पादन पर बड़े प्रभाव की आशंका नहीं है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में जल संकट और वर्षा की कमी को लेकर निगरानी जारी है।
20 लाख हेक्टेयर पीछे चल रही खरीफ बुआई
बारिश के असमान वितरण का असर खरीफ फसलों की बुआई पर दिखाई दे रहा है। उपलब्ध आकलन के मुताबिक इस वर्ष अब तक खरीफ फसलों का कुल बुआई क्षेत्र पिछले वर्ष की तुलना में करीब 20 लाख हेक्टेयर कम है। हालांकि अगस्त के मध्य तक यह अंतर काफी कम हुआ है और सरकार को उम्मीद है कि आगे की बारिश के साथ इसमें और सुधार हो सकता है। 14 अगस्त तक देश में खरीफ फसलों की बुआई 1,016.57 लाख हेक्टेयर तक पहुंच चुकी थी, जो सामान्य औसत क्षेत्र का करीब 92 प्रतिशत है और पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 2 प्रतिशत कम थी। इससे संकेत मिलता है कि राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन अभी व्यापक कृषि संकट की स्थिति नहीं बनी है।
कर्नाटक और महाराष्ट्र में सबसे अधिक असर
बारिश की कमी और बुआई में गिरावट का असर राज्यों में समान रूप से नहीं पड़ा है। कर्नाटक में बुआई का रकबा करीब 14 लाख हेक्टेयर कम बताया गया है, जबकि महाराष्ट्र में यह कमी लगभग 8 लाख हेक्टेयर है। ओडिशा और झारखंड में भी करीब 2-2 लाख हेक्टेयर की कमी सामने आई है। कृषि मंत्री ने कर्नाटक की स्थिति को विशेष रूप से संतोषजनक नहीं बताया है, जबकि पहले की सरकारी समीक्षाओं में कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में जल संकट की बात भी सामने आई थी। ऐसे क्षेत्रों में आने वाले दिनों की बारिश फसल बचाने, मिट्टी में नमी बनाए रखने और किसानों को दोबारा बुआई जैसी स्थिति से बचाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
धान की बुआई में सबसे ज्यादा कमी
खरीफ फसलों में धान की बुआई में कमी विशेष ध्यान खींच रही है, क्योंकि धान देश की खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण फसल है। मानसून की बारिश धान की खेती के लिए पानी का प्रमुख स्रोत है और वर्षा के समय तथा वितरण में असमानता होने पर बुआई और फसल की वृद्धि दोनों प्रभावित हो सकती हैं। इसके बावजूद सरकार का मौजूदा आकलन है कि बुआई में आई कमी का खाद्यान्न उत्पादन पर अभी बड़ा असर पड़ने की आशंका नहीं है। यदि अगस्त के शेष दिनों और सितंबर में पर्याप्त तथा नियमित बारिश होती है, तो कई क्षेत्रों में फसल की स्थिति बेहतर हो सकती है और मौजूदा अंतर का कुछ हिस्सा भी कम हो सकता है।
बारिश का राष्ट्रीय आंकड़ा अब भी सामान्य दायरे में
मॉनसून की कमी को लेकर चिंता के बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर वर्तमान वर्षा की कमी अभी सामान्य श्रेणी के भीतर है। मौसम संबंधी मानकों के अनुसार सामान्य से 19 प्रतिशत तक कम वर्षा को सामान्य श्रेणी में माना जाता है। इसलिए 13 प्रतिशत की वर्तमान कमी को राष्ट्रीय स्तर पर असामान्य या अत्यधिक सूखे की स्थिति नहीं कहा जा सकता। हाल की बारिश ने भी तस्वीर में सुधार किया है। सरकार के अनुसार पहले वर्षा की कमी से प्रभावित जिलों की संख्या काफी अधिक थी, लेकिन अब यह संख्या घटकर करीब 100 के आसपास रह गई है। फिर भी जिला और राज्य स्तर पर वर्षा का वितरण राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
सरकार ने निगरानी और आकस्मिक तैयारी बढ़ाई
केंद्र सरकार ने मानसून, बुआई, जल उपलब्धता, बीज और उर्वरक की स्थिति पर लगातार निगरानी रखने की व्यवस्था की है। जुलाई में कृषि मंत्रालय की समीक्षा के दौरान कम बारिश वाले संवेदनशील जिलों की पहचान कर राज्यों के साथ समन्वय बढ़ाने और जरूरत पड़ने पर आकस्मिक कृषि योजनाएं लागू करने के निर्देश दिए गए थे। मंत्रालय ने फसल की स्थिति पर नजर रखने के लिए वर्षा के साथ उपग्रह आधारित वनस्पति सूचकांक जैसी वैज्ञानिक जानकारी के उपयोग पर भी जोर दिया है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि किसी क्षेत्र में बारिश लंबे समय तक कमजोर रहती है तो वहां किसानों के लिए वैकल्पिक फसल, बीज, उर्वरक और अन्य कृषि सहायता की व्यवस्था समय रहते की जा सके।
सितंबर की बारिश अब होगी सबसे निर्णायक
अब खरीफ मौसम की अगली दिशा काफी हद तक अगस्त के अंतिम दिनों और सितंबर की बारिश पर निर्भर करेगी। सामान्य और अच्छी तरह वितरित बारिश होने पर जिन क्षेत्रों में बुआई पीछे चल रही है, वहां स्थिति में सुधार की गुंजाइश बनी हुई है। दूसरी ओर लंबे समय तक शुष्क दौर रहने पर पहले से प्रभावित क्षेत्रों में फसल की उत्पादकता पर दबाव बढ़ सकता है। कृषि विशेषज्ञों के लिए केवल बारिश की कुल मात्रा ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि यह भी मायने रखता है कि बारिश कब, कहां और कितनी नियमितता से होती है। इसलिए आने वाले सप्ताहों में मौसम का वितरण खरीफ उत्पादन का अधिक सटीक संकेत देगा।
फिलहाल खाद्यान्न उत्पादन को लेकर सरकार आश्वस्त
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मौजूदा परिस्थितियों के बावजूद खरीफ उत्पादन को लेकर आशावादी रुख अपनाया है। उनका कहना है कि देश के अधिकांश हिस्सों में फसलों की जरूरत के मुताबिक पर्याप्त बारिश हुई है और अभी ऐसा कोई संकेत नहीं है जिससे समग्र खरीफ उत्पादन पर बड़ा असर माना जाए। 18 अगस्त को उन्होंने यह भी कहा था कि कुछ क्षेत्रों को छोड़कर स्थिति सामान्य बनी हुई है और बारिश ने अधिकांश फसलों की पानी की जरूरत पूरी की है। हालांकि कर्नाटक और तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों में स्थानीय स्तर पर पानी की कमी को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत बताई गई है।
किसानों के लिए मौसम की अगली चाल सबसे अहम
मौजूदा स्थिति को देखते हुए किसानों के लिए अगले कुछ सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण हैं। जहां बुआई हो चुकी है, वहां फसल की नमी और स्वास्थ्य की निगरानी जरूरी होगी, जबकि जिन क्षेत्रों में बुआई का रकबा अभी कम है, वहां स्थानीय मौसम और उपलब्ध पानी के आधार पर आगे की रणनीति तय करनी होगी। सरकार की ओर से भी राज्यों और कृषि संस्थानों के साथ लगातार समन्वय रखने पर जोर दिया जा रहा है। फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति को संकटपूर्ण नहीं माना जा रहा, लेकिन कर्नाटक, महाराष्ट्र और अन्य वर्षा-कमी वाले क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों पर नजर बनाए रखना आवश्यक है। यदि सितंबर में मॉनसून सामान्य रहा, तो मौजूदा बुआई अंतर और उत्पादन संबंधी चिंता काफी हद तक कम हो सकती है।