झारखंड में जेपीएससी की परीक्षाओं और नियुक्तियों को लेकर चल रहे विवाद में गुरुवार को बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया। झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से जेपीएससी की 11वीं से 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा और फूड सेफ्टी ऑफिसर परीक्षा से जुड़ी नियुक्तियों को रद्द करने के फैसले पर फिलहाल रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान सरकार के आदेश पर अगले आदेश तक अंतरिम रोक लगाते हुए झारखंड सरकार और झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) से जवाब मांगा है। हाईकोर्ट का यह आदेश उन सफल अभ्यर्थियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, जिनका चयन परीक्षा प्रक्रिया के बाद हुआ था और कई अभ्यर्थी नियुक्ति के बाद अपनी सेवा भी शुरू कर चुके थे। कुछ चयनित उम्मीदवार प्रशिक्षण तक पूरा कर चुके हैं। अब सरकार के उस फैसले पर फिलहाल रोक लग गई है, जिसके तहत इन परीक्षाओं और उनसे जुड़ी नियुक्तियों को रद्द किया गया था।
सफल अभ्यर्थियों की याचिकाओं पर हुई सुनवाई
मामले की सुनवाई उन अभ्यर्थियों की याचिकाओं पर हुई, जिन्होंने सरकार के परीक्षा और नियुक्ति रद्द करने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखा और नियुक्तियां रद्द किए जाने के सरकार के फैसले पर सवाल उठाए। 11वीं से 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा से जुड़े मामले में दीपमाला एवं अन्य तथा सोनम कुमारी की ओर से याचिकाएं दाखिल की गई हैं। इन याचिकाओं में जेपीएससी की विज्ञापन संख्या 01/2024 के तहत आयोजित परीक्षा और उसके आधार पर हुई नियुक्तियों को रद्द करने के सरकारी निर्णय को चुनौती दी गई है। वहीं, सौरव सिंह एवं अन्य ने फूड सेफ्टी ऑफिसर की नियुक्तियां रद्द किए जाने के खिलाफ अदालत का रुख किया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा, अमृतांश वत्स और पीएएस पति ने अदालत में पक्ष रखा।
नियुक्ति के बाद कई अभ्यर्थी सेवा और प्रशिक्षण पूरा कर चुके
इस मामले की एक अहम बात यह है कि जिन नियुक्तियों पर सरकार ने सवाल उठाते हुए उन्हें रद्द करने का फैसला लिया, उनमें चयनित कई अभ्यर्थी केवल परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं थे। उन्हें नियुक्ति पत्र मिल चुके थे और कुछ उम्मीदवारों ने संबंधित पदों पर योगदान भी दे दिया था। कई अभ्यर्थियों ने नियुक्ति के बाद निर्धारित प्रशिक्षण भी पूरा कर लिया है। ऐसे में परीक्षा और नियुक्ति को एक साथ रद्द करने के सरकारी फैसले से चयनित उम्मीदवारों के भविष्य पर सीधा असर पड़ रहा था। इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने अदालत से सरकार के फैसले पर रोक लगाने की मांग की थी। हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल इन अभ्यर्थियों को राहत मिली है।
सोनम कुमारी ने दूसरी नौकरी छोड़कर दी थी परीक्षा
याचिका में सोनम कुमारी की ओर से अपने मामले को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी अदालत के सामने रखी गई। उनका कहना है कि झारखंड में नियुक्ति पाने के लिए उन्होंने दूसरी जगह की अपनी नौकरी छोड़ दी थी। उन्हें 24 नवंबर 2025 को नियुक्ति पत्र मिला था और इसके बाद उन्होंने प्रशिक्षण भी पूरा किया। लेकिन 18 अगस्त को राज्य सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के बाद परीक्षा और नियुक्ति रद्द किए जाने की जानकारी सामने आई। याचिका में उन्होंने सरकार के इस फैसले को निरस्त करने की मांग की है। उनके मामले का हवाला देते हुए यह भी बताया गया कि चयनित अभ्यर्थियों ने नियुक्ति प्रक्रिया पर भरोसा करके अपने करियर से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लिए थे।
याचिकाकर्ताओं ने कहा- गड़बड़ी हुई तो दोषियों पर हो कार्रवाई
अभ्यर्थियों की ओर से अदालत में मुख्य तर्क यह रखा गया कि अगर भर्ती प्रक्रिया के दौरान किसी स्तर पर अनियमितता हुई है, तो उसकी जांच की जानी चाहिए और जो लोग दोषी पाए जाएं, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पूरी भर्ती प्रक्रिया में सफल होने वाले ऐसे उम्मीदवारों की नियुक्ति को सामूहिक रूप से रद्द करना उचित नहीं है, जिनके खिलाफ व्यक्तिगत तौर पर किसी तरह की गड़बड़ी का आरोप या जांच नहीं हुई है। अभ्यर्थियों ने यह भी दलील दी कि उन्हें बिना व्यक्तिगत जांच और सुनवाई का अवसर दिए नियुक्ति से वंचित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है। इसी तर्क के आधार पर उन्होंने अदालत से सरकार के आदेश पर रोक लगाने की मांग की थी।
सरकार ने प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता का हवाला दिया
दरअसल, झारखंड सरकार ने प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर सीआईडी जांच से सामने आए तथ्यों के आधार पर कई परीक्षाओं पर कार्रवाई का फैसला लिया था। सरकार की ओर से 18 अगस्त की देर रात जारी फैसलों के बाद अलग-अलग परीक्षाओं और नियुक्ति प्रक्रियाओं को लेकर अधिसूचनाएं जारी की गईं। सरकार ने वर्ष 2014 के बाद आयोजित विभिन्न नियुक्ति परीक्षाओं में संभावित अनियमितताओं की जांच कराने की बात भी कही थी। इसी क्रम में कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग की ओर से जारी अधिसूचनाओं में 22 परीक्षाओं को रद्द करने, 6 परीक्षाओं की प्रक्रिया स्थगित करने और 17 अन्य परीक्षाओं को जांच के दायरे में रखने की जानकारी दी गई थी।
सरकार के फैसले के बाद अभ्यर्थियों ने शुरू किया आंदोलन
परीक्षाएं और नियुक्तियां रद्द किए जाने की खबर सामने आने के बाद चयनित और नियुक्त अभ्यर्थियों में नाराजगी बढ़ गई थी। कई अभ्यर्थियों ने सरकार के फैसले के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। अभ्यर्थियों का कहना था कि यदि भर्ती प्रक्रिया में किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए, लेकिन जिन उम्मीदवारों ने परीक्षा में भाग लिया, मेरिट के आधार पर चयनित हुए और नियुक्ति भी प्राप्त कर ली, उनके भविष्य को सामूहिक रूप से प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए। अब हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद इस आंदोलन और कानूनी विवाद को नई दिशा मिली है।
हाईकोर्ट ने सरकार और JPSC से मांगा जवाब
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने फिलहाल सरकार के फैसले पर रोक लगाने के साथ ही झारखंड सरकार और JPSC से जवाब मांगा है। इसका मतलब यह है कि हाईकोर्ट ने अभी मामले का अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। अदालत ने केवल सरकार के नियुक्तियां रद्द करने के निर्णय के प्रभाव को अगले आदेश तक रोक दिया है। अब सरकार और जेपीएससी की ओर से अदालत में अपना पक्ष और संबंधित रिकॉर्ड प्रस्तुत किया जाएगा। इसके बाद अदालत मामले की आगे सुनवाई करेगी।
फिलहाल सफल अभ्यर्थियों को मिली बड़ी राहत
हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश से उन अभ्यर्थियों को तत्काल राहत मिली है, जिनका चयन जेपीएससी की संबंधित परीक्षाओं के माध्यम से हुआ था। नियुक्ति रद्द किए जाने के फैसले से प्रभावित उम्मीदवारों के लिए यह आदेश महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, यह राहत फिलहाल अंतरिम है। अंतिम स्थिति अदालत में आगे होने वाली सुनवाई और सरकार तथा JPSC की ओर से दिए जाने वाले जवाब के बाद स्पष्ट होगी। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि नियुक्तियां स्थायी रूप से सुरक्षित हो गई हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि सरकार के रद्दीकरण आदेश का प्रभाव अगले आदेश तक रुका रहेगा।
अब आगे क्या होगा?
अब मामले में अगली महत्वपूर्ण प्रक्रिया सरकार और JPSC का जवाब दाखिल करना होगी। अदालत संबंधित रिकॉर्ड और पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद आगे का आदेश जारी करेगी। यदि सरकार भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं से जुड़े अपने पक्ष को अदालत के सामने रखती है, तो याचिकाकर्ता भी उसका जवाब देंगे। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि नियुक्तियों को लेकर अंतरिम रोक जारी रखी जाए या मामले में कोई अन्य आदेश दिया जाए। फिलहाल इस पूरे विवाद का केंद्र यही है कि भर्ती प्रक्रिया में यदि अनियमितता हुई है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है और क्या उसका असर पूरी चयन प्रक्रिया में सफल हुए सभी अभ्यर्थियों की नियुक्तियों पर डाला जा सकता है।