भ्रूण के लिंग की जांच और लिंग चयन जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने वाले पीसीपीएनडीटी अधिनियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार, 20 अगस्त को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि इस विशेष कानून के तहत अपराधों की जांच करने के लिए पुलिस को स्वतंत्र जांच एजेंसी के रूप में अधिकार प्राप्त नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून ने जिन अधिकारियों को कार्रवाई के लिए अधिकृत किया है, उन्हीं को इस अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कदम उठाना होगा। यह निर्णय देश में भ्रूण के लिंग की पहचान और लिंग चयन पर रोक लगाने वाली नियामकीय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कानून का उद्देश्य भ्रूण के लिंग की पहचान पर रोक लगाना
पीसीपीएनडीटी अधिनियम का मूल उद्देश्य गर्भधारण से पहले और गर्भावस्था के दौरान ऐसी चिकित्सकीय तकनीकों के दुरुपयोग को रोकना है, जिनका इस्तेमाल भ्रूण के लिंग का पता लगाने या लिंग चयन के लिए किया जा सकता है। कानून चिकित्सा तकनीकों के ऐसे उपयोग पर नियंत्रण स्थापित करता है, जो कन्या भ्रूण हत्या और लिंग आधारित भेदभाव जैसी गंभीर सामाजिक समस्याओं को बढ़ावा दे सकते हैं। इसके तहत चिकित्सकीय संस्थानों, संबंधित तकनीकों और उनके इस्तेमाल से जुड़े विभिन्न पहलुओं के लिए नियामकीय प्रावधान बनाए गए हैं। इसलिए इस कानून के तहत कार्रवाई सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में विशेष तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़ी हुई है।
पुलिस को क्यों नहीं दी गई सीधे जांच की शक्ति
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने आदेश में इस बात पर जोर दिया कि पीसीपीएनडीटी अधिनियम तकनीकी प्रकृति का विशेष कानून है। ऐसे मामलों में चिकित्सकीय जानकारी, दस्तावेजों की जांच और कानून के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं की समझ आवश्यक हो सकती है। अदालत ने इसी संदर्भ में कहा कि इस अधिनियम के उद्देश्य के लिए पुलिस जांच करने वाली प्राथमिक एजेंसी नहीं है। कानून में जिन अधिकारियों को विशेष रूप से अधिकृत किया गया है, उन्हें ही इसके प्रावधानों के तहत जांच और कार्रवाई की जिम्मेदारी निभानी होगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य विशेष कानून की प्रक्रिया और उसकी तकनीकी प्रकृति को बनाए रखना है।
अधिकृत अधिकारी करेंगे कानून के तहत कार्रवाई
पीठ ने स्पष्ट किया कि पीसीपीएनडीटी अधिनियम के अंतर्गत कार्रवाई करने की जिम्मेदारी उन्हीं अधिकारियों की होगी, जिन्हें कानून और उसके तहत बनाए गए नियमों में अधिकार दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि किसी मामले में केवल इस आधार पर पुलिस सीधे पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू नहीं कर सकती कि कथित रूप से कानून का उल्लंघन हुआ है। संबंधित प्राधिकरण को पहले कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। इस व्यवस्था से अधिनियम के तहत कार्रवाई को एक विशिष्ट वैधानिक ढांचे के भीतर रखने का प्रयास किया गया है।
पुलिस की भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं हुई
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का यह अर्थ नहीं है कि ऐसे मामलों में पुलिस की कोई भूमिका ही नहीं होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्धारित नियमों के अनुसार पुलिस सहायक भूमिका निभा सकती है। यानी अधिकृत अधिकारी को जांच या कार्रवाई के दौरान पुलिस की सहायता की आवश्यकता हो सकती है और ऐसी स्थिति में पुलिस सहयोग कर सकती है। महत्वपूर्ण अंतर यह है कि पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत कार्रवाई का मूल अधिकार संबंधित अधिकृत प्राधिकारी के पास रहेगा। इस अंतर को समझना इसलिए जरूरी है, क्योंकि अदालत ने पुलिस की सहायता की भूमिका और स्वतंत्र जांच की शक्ति को अलग-अलग माना है।
सामान्य आपराधिक कानून पर नहीं पड़ेगा असर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण सीमा भी स्पष्ट की है। अदालत ने कहा कि पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत पुलिस की सीधी जांच पर लगाई गई रोक केवल इसी विशेष कानून के अपराधों तक सीमित है। यदि किसी घटना में मुख्य आपराधिक कानून के तहत कोई अलग अपराध बनता है, तो पुलिस उस अपराध की जांच और अभियोजन करने की अपनी वैधानिक शक्ति का इस्तेमाल कर सकती है। यानी इस फैसले को पुलिस की सामान्य आपराधिक जांच शक्तियों पर व्यापक रोक के रूप में नहीं देखा जा सकता। अदालत ने विशेष कानून और सामान्य आपराधिक कानून के बीच अधिकार क्षेत्र की सीमा को स्पष्ट किया है।
मामला प्राथमिकी और जांच की पुलिस शक्ति से जुड़ा था
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला पीसीपीएनडीटी अधिनियम, 1994 के तहत प्राथमिकी दर्ज करने और अपराधों की जांच करने की पुलिस की शक्ति से संबंधित था। सुनवाई के दौरान मुख्य प्रश्न यह था कि क्या पुलिस इस विशेष कानून के तहत अपने स्तर पर प्राथमिकी दर्ज करके जांच आगे बढ़ा सकती है या इसके लिए अधिनियम में निर्धारित अधिकारियों की प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। अदालत ने अपने आदेश में अधिकृत अधिकारियों की भूमिका को प्राथमिकता दी है। हालांकि फैसले के विस्तृत कारणों और कानूनी व्याख्या को पूरी तरह समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट के विस्तृत निर्णय का इंतजार रहेगा।
लिंग चयन पर रोक की व्यवस्था में फैसले का महत्व
भारत में भ्रूण के लिंग की पहचान और लिंग चयन पर रोक सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है। ऐसे मामलों में कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ यह भी आवश्यक है कि जांच निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप हो। सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला इसी संतुलन को रेखांकित करता है। एक ओर अधिकृत अधिकारियों की विशेष जिम्मेदारी स्पष्ट की गई है, वहीं दूसरी ओर जरूरत पड़ने पर पुलिस की सहायक भूमिका को स्वीकार किया गया है। विस्तृत फैसला आने के बाद यह और स्पष्ट होगा कि इस व्यवस्था का व्यावहारिक प्रभाव राज्यों में पीसीपीएनडीटी अधिनियम के क्रियान्वयन और जांच प्रक्रिया पर किस प्रकार पड़ेगा।