तृणमूल कांग्रेस (TMC) छोड़कर नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल हुए 20 सांसदों की सदस्यता रद्द करने के मामले में नया मोड़ आ गया है। लोक सभा सचिवालय और अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा भेजे गए नोटिस का जवाब देने के लिए इन सांसदों ने लोक सभा अध्यक्ष से 3 हफ्ते (लगभग 21 दिन) का अतिरिक्त समय मांगा है। पूर्व में लोक सभा सचिवालय ने इन सांसदों को नोटिस जारी कर मंगलवार तक यह स्पष्ट करने को कहा था कि दल-बदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) के तहत उनकी सदस्यता क्यों न समाप्त कर दी जाए।
2026 विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी में पड़ी थी फूट
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद टीएमसी के बहुसंख्यक सांसदों ने बगावत का बिगुल फूंक दिया था। सुदीप बंद्योपाध्याय, डॉ. काकोली घोष दस्तीदार और शताब्दी राय की अगुवाई में 20 सांसदों ने टीएमसी छोड़कर एनडीए समर्थित एनसीपीआई (NCPI) में शामिल होने का फैसला किया था। इसके बाद संसद में उनकी बैठने की व्यवस्था में भी बदलाव हुआ था। हालांकि, तकनीकी और कानूनी रूप से उन्हें अभी तक लोक सभा में एनसीपीआई के स्वतंत्र सांसदों के रूप में पूर्ण मान्यता नहीं मिली है।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे अभिषेक बनर्जी
मानसून सत्र के दौरान टीएमसी के लोक सभा संसदीय दल के नेता अभिषेक बनर्जी ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने लोक सभा अध्यक्ष को पत्र लिखने के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि बागी सांसदों की सदस्यता तुरंत रद्द की जाए। इसके बाद चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने मामले पर संज्ञान लिया और लोक सभा अध्यक्ष से कार्यवाही की प्रगति रिपोर्ट मांगी थी। सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद लोक सभा सचिवालय ने सभी 20 बागी सांसदों को कारण बताओ नोटिस जारी किया था।
कानूनी राय और पीएमओ से चर्चा के बाद मांगा समय
नोटिस मिलने के बाद से ही एनसीपीआई गुट के बागी सांसद कानूनी विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, सांसदों ने देश के शीर्ष वकीलों और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से सलाह-मशविरा करने के बाद अपना विस्तृत जवाब तैयार करने के लिए समय बढ़ाने का फैसला किया। लोक सभा में एनसीपीआई गुट के नेता सुदीप बंद्योपाध्याय ने पुष्टि की है कि उन्होंने लोक सभा सचिवालय को पत्र भेजकर अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा है।
दल-बदल कानून के तहत फंसा पेंच
टीएमसी का तर्क है कि संविधान की 10वीं अनुसूची के अनुसार केवल राजनीतिक दलों का विलय हो सकता है, व्यक्तिगत सांसदों का नहीं। वहीं बागी सांसदों का दावा है कि उनके पास टीएमसी के दो-तिहाई से अधिक सांसदों का समर्थन है, इसलिए उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होता। अब देखना यह होगा कि लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला इन सांसदों को अतिरिक्त समय देते हैं या इस ऐतिहासिक अयोग्यता मामले पर जल्द कोई निर्णय लेते हैं।