अमेरिकी नारीवादी आंदोलन की सबसे प्रभावशाली आवाजों में शामिल ग्लोरिया स्टाइनम का 2 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क स्थित उनके घर में निधन हो गया। वह 92 वर्ष की थीं। उनके निधन की घोषणा उनकी संस्था ग्लोरिया फाउंडेशन ने की और बताया कि उन्होंने अपने घर में अपने प्रियजनों के बीच शांतिपूर्वक अंतिम सांस ली। मृत्यु का कारण सार्वजनिक नहीं किया गया। उनके निधन के बाद राजनीतिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सांस्कृतिक जगत की हस्तियों ने उन्हें आधुनिक महिला आंदोलन की ऐसी अग्रणी आवाज के रूप में याद किया, जिसने कई पीढ़ियों को समानता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी।
पत्रकारिता से शुरू हुई बदलाव की यात्रा
ग्लोरिया स्टाइनम का जन्म 25 मार्च 1934 को ओहायो के टोलेडो में हुआ था। उनका बचपन स्थिर नहीं रहा और परिवार के बार-बार स्थान बदलने के कारण उनकी औपचारिक शिक्षा भी नियमित नहीं रही। बाद में उन्होंने स्मिथ कॉलेज से राजनीति विज्ञान की पढ़ाई की और 1956 में स्नातक की उपाधि हासिल की। इसके बाद उन्हें भारत में 2 वर्ष तक लेखन और शोध के लिए छात्रवृत्ति मिली। भारत में उन्होंने गांवों की यात्राएं कीं, आम महिलाओं की समस्याओं को करीब से समझा और महात्मा गांधी के अनुयायियों से जनसंगठन की पद्धतियां सीखीं। इस अनुभव ने आगे चलकर उनके सामाजिक और राजनीतिक कार्यों को गहराई से प्रभावित किया।
पत्रकारिता ने दिखाया महिलाओं के साथ भेदभाव
अमेरिका लौटने के बाद स्टाइनम ने पत्रकारिता को अपना पेशा बनाया और जल्द ही उस दौर की महिला पत्रकारों के सामने मौजूद भेदभाव को स्वयं अनुभव किया। 1963 में उन्होंने न्यूयॉर्क के एक प्लेबॉय क्लब में छद्म रूप से काम किया और वहां महिला कर्मचारियों के साथ होने वाले व्यवहार तथा कम वेतन पर विस्तृत रिपोर्ट लिखी। यह रिपोर्ट उनके पत्रकारिता जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ बनी। बाद में उन्होंने महिलाओं के जीवन से जुड़े उन मुद्दों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाया, जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया अक्सर नजरअंदाज करता था। पत्रकारिता से सामाजिक सक्रियता की ओर उनका बढ़ना इसी अनुभव और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े व्यापक सवालों की समझ के साथ हुआ।
मिस पत्रिका ने महिला आंदोलन को दी नई आवाज
1970 के दशक की शुरुआत में स्टाइनम ने महिलाओं के लिए गंभीर और प्रभावशाली पत्रकारिता को नया मंच देने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने 1972 में मिस पत्रिका की सह-स्थापना की और करीब 15 वर्षों तक उसके संपादकीय काम से जुड़ी रहीं। उस समय महिलाओं के लिए ऐसी पत्रिका का सामने आना अपने आप में महत्वपूर्ण बदलाव था, क्योंकि इसमें महिलाओं के अधिकार, गर्भपात, कामकाजी जीवन, समानता और सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा गया। स्टाइनम ने राष्ट्रीय महिला राजनीतिक समूह सहित कई संगठनों के गठन में भी भूमिका निभाई और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में काम किया।
प्रजनन अधिकार और समानता बनीं प्रमुख लड़ाइयां
स्टाइनम का आंदोलन केवल रोजगार या राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं था। उन्होंने महिलाओं को अपने शरीर और जीवन के संबंध में निर्णय लेने की स्वतंत्रता का प्रबल समर्थन किया। 1960 के दशक के अंत में महिलाओं के गर्भपात संबंधी अनुभवों पर हुई बैठकों ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और उन्होंने प्रजनन अधिकारों को अपने सार्वजनिक अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। 2022 में अमेरिकी उच्चतम न्यायालय द्वारा रो बनाम वेड के फैसले को पलटे जाने के बाद भी उन्होंने प्रजनन स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई। उनके लिए महिला अधिकारों का अर्थ राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को एक साथ देखना था।
आंदोलन में नस्ल और वर्ग की बराबरी पर जोर
स्टाइनम ने नारीवादी आंदोलन को केवल अपेक्षाकृत संपन्न श्वेत महिलाओं तक सीमित रखने के बजाय अलग-अलग नस्ल, वर्ग और सामाजिक पृष्ठभूमि की महिलाओं को शामिल करने पर जोर दिया। वह मानती थीं कि महिलाओं के साथ होने वाला भेदभाव नस्ल और सामाजिक असमानता से अलग करके नहीं समझा जा सकता। उनके विचारों को लेकर कई बार राजनीतिक और सामाजिक विवाद भी हुए, लेकिन वह सार्वजनिक बहस से पीछे नहीं हटीं। उनका जोर लगातार इस बात पर रहा कि महिलाओं की समानता का संघर्ष व्यापक सामाजिक न्याय के प्रश्नों से जुड़ा है। यही दृष्टिकोण उन्हें अमेरिकी महिला आंदोलन की सबसे चर्चित और प्रभावशाली आवाजों में शामिल करता है।
लेखन, संगठन और मीडिया में छोड़ी गहरी छाप
स्टाइनम ने सामाजिक सक्रियता के साथ लेखन और दृश्य माध्यमों में भी महत्वपूर्ण काम किया। उनकी चर्चित पुस्तकों में 1983 की आउटरेजस एक्ट्स एंड एवरीडे रिबेलियंस, 1986 की मैरिलिन: नॉर्मा जीन, 1992 की रिवॉल्यूशन फ्रॉम विदिन और 2015 का संस्मरण माय लाइफ ऑन द रोड शामिल हैं। उन्होंने महिलाओं के खिलाफ हिंसा और बाल शोषण जैसे विषयों पर टेलीविजन परियोजनाओं में भी काम किया। 2005 में उन्होंने जेन फोंडा और रॉबिन मॉर्गन के साथ महिला मीडिया केंद्र की स्थापना की, जिसका उद्देश्य समाचार और मीडिया में महिलाओं की आवाज तथा नेतृत्व की मौजूदगी बढ़ाना था।
राष्ट्रपति पदक से हुआ सम्मान
महिला अधिकारों के लिए उनके दशकों लंबे योगदान को अमेरिकी सरकार ने भी सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मान्यता दी। 2013 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम से सम्मानित किया। यह सम्मान अमेरिका का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है। इसके बावजूद स्टाइनम ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक खुद को केवल किसी एक पुरस्कार या पद से परिभाषित नहीं होने दिया। वह लगातार यात्रा करती रहीं, सार्वजनिक कार्यक्रमों में बोलती रहीं और महिलाओं के अधिकारों, सामाजिक न्याय तथा समानता के सवालों पर सक्रिय बनी रहीं।
निजी जीवन में भी चुनी अपनी राह
स्टाइनम लंबे समय तक विवाह संस्था को लेकर आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखती थीं और उनका मानना था कि पुराने सामाजिक ढांचे महिलाओं की स्वतंत्रता सीमित करते थे। हालांकि 2000 में उन्होंने डेविड बेल से विवाह किया। उस समय उन्होंने स्पष्ट किया था कि विवाह संस्था और उसके कानूनी ढांचे में बदलाव के कारण अब समान साझेदारी संभव है। बेल का 2003 में निधन हो गया। उनका निजी जीवन भी उनके व्यापक विचारों से जुड़ा रहा—अपने लिए जीवन का रास्ता चुनने की स्वतंत्रता और महिलाओं के लिए सामाजिक अपेक्षाओं से बाहर निकलने का अधिकार उनके सार्वजनिक चिंतन के प्रमुख हिस्से रहे।
विरासत अब आंदोलन की अगली पीढ़ी के नाम
ग्लोरिया स्टाइनम की विरासत किसी एक संगठन, पत्रिका या पुस्तक तक सीमित नहीं है। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों को अमेरिकी सार्वजनिक जीवन के केंद्र में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और पत्रकारिता, राजनीति तथा सामाजिक आंदोलनों के बीच एक मजबूत पुल बनाया। उनकी मृत्यु के साथ एक युग का महत्वपूर्ण अध्याय जरूर समाप्त हुआ है, लेकिन जिन सवालों को उन्होंने उठाया—समान वेतन, प्रजनन स्वतंत्रता, राजनीतिक भागीदारी, मीडिया में प्रतिनिधित्व और लैंगिक न्याय—वे आज भी दुनिया के कई हिस्सों में प्रासंगिक हैं। उनकी सबसे बड़ी विरासत शायद यही है कि उन्होंने महिलाओं को केवल अधिकार मांगने के बजाय अपने जीवन और भविष्य पर अधिकार जताने की भाषा दी।