भोपाल। मध्यप्रदेश कांग्रेस में राज्यसभा सीट विवाद और मीनाक्षी नटराजन के नामांकन निरस्त होने के बाद बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है। इस पूरे मामले में प्रदेश के सात वरिष्ठ नेताओं की भूमिका पर सवाल उठे हैं, जिससे राष्ट्रीय नेतृत्व नाराज बताया जा रहा है। मामला अब संगठनात्मक चूक से आगे बढ़कर आंतरिक समीक्षा और सख्ती की दिशा में जाता दिख रहा है।
राज्यसभा सीट विवाद और राजनीतिक उलटफेर
मध्यप्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों में से एक सीट कांग्रेस के खाते में जाने की संभावना थी, लेकिन चुनावी समीकरण बदल गए। बीजेपी की रणनीति और क्रॉस वोटिंग की आशंका के बीच कांग्रेस अपनी सीट बचाने में नाकाम रही। पार्टी में इसे “सीट चोरी” बताया जा रहा है, जबकि भीतरखाने संगठनात्मक कमजोरी भी सामने आ रही है।
मीनाक्षी नटराजन नामांकन मामला
कांग्रेस की ओर से उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने के बाद विवाद और गहरा गया। इस फैसले के बाद कांग्रेस ने निर्वाचन आयोग और बीजेपी पर मोर्चा खोल दिया है। वहीं पार्टी के भीतर इस चूक को लेकर गंभीर समीक्षा शुरू हो गई है, जिससे कई नेताओं की भूमिका सवालों में आ गई है।
राष्ट्रीय नेतृत्व की नाराजगी और आंतरिक समीक्षा
सूत्रों के अनुसार कांग्रेस नेतृत्व इस पूरे घटनाक्रम से असंतुष्ट है और मामले की विस्तृत समीक्षा की जा रही है। राहुल गांधी के स्तर पर भी इसे गंभीर चूक माना जा रहा है। पार्टी अब प्रदेश नेतृत्व और चुनाव प्रबंधन से जुड़े पहलुओं की जांच कर रही है।
सात नेताओं की भूमिका पर सवाल
इस पूरे प्रकरण में प्रदेश के सात प्रमुख नेताओं की भूमिका पर सवाल उठे हैं। इनमें संगठन और चुनाव प्रबंधन से जुड़े वरिष्ठ नेता शामिल हैं, जिनकी कार्यशैली और निर्णय प्रक्रिया पर राष्ट्रीय नेतृत्व असंतुष्ट बताया जा रहा है।
1. दिग्विजय सिंह
राज्यसभा के लिए मीनाक्षी नटराजन का नाम घोषित होते ही उनके समर्थक खुलेआम विरोध पर उतर आए। हाईकमान के निर्णय पर सवाल उठाए। जब पूरी पार्टी नामांकन निरस्त होने के मुद्दे को उठा रही थी तब दिग्विजय के एक समर्थक ने उन्हें सीएम बनाने की मांग कर डाली।
2. कमलनाथ
पूर्व सीएम व सबसे वरिष्ठ विधायक होने के बावजूद मीनाक्षी नटराजन के प्रति समर्थन व्यक्त करने के लिए बुलाई गई बैठक कांग्रेस विधायक दल की बैठक में नहीं आए। हालांकि वर्चुअली समर्थन जताया। उनके एक समर्थक विधायक, एयरपोर्ट पर घंटों बैठाए रखने पर अपनी ही पार्टी पर बरस पड़े।
3. जीतू पटवारी
प्रदेश अध्यक्ष होने के बावजूद रणनीतिक चूक और राजनीतिक घटनाक्रम को सही तरीके से भांप न पाने पर सवाल उठे।
4. उमंग सिंघार
मीनाक्षी नटराजन, खुद राहुल गांधी की उम्मीदवार थीं। पीसीसी चीफ के साथ ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उमंग सिंघार पर भी इसकी पूरी जवाबदारी थी। आलाकमान की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे।
5. हरीश चौधरी
प्रदेश प्रभारी के रूप में वरिष्ठ नेताओं से समन्वय का अभाव साफ नजर आया। नामांकन निरस्त कर दिए जाने की रात कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेस में दिग्विजय सिंह से खुलेआम कह दिया कि अब आप रहने दीजिए, हम कर लेंगे। बाद में कथित तौर पर माफी मांगी पर नुकसान हो चुका था।
6. जेपी धनोपिया
प्रदेश के केवल वरिष्ठ नेता और अधिवक्ता ही नहीं बल्कि चुनाव मामलों के प्रभारी भी हैं। ढाई दशक के अनुभव के बावजूद चूक कर बैठे।
7. मीनाक्षी नटराजन
खास बात यह है कि राष्ट्रीय नेतृत्व मीनाक्षी नटराजन की भूमिका से भी संतुष्ट नहीं है। 4 दिन पहले उम्मीदवारी घोषित कर दिए जाने के बाद भी वे आवश्यक सतर्कता नहीं बरत सकीं।