नई दिल्ली. भारत में वन क्षेत्र और वृक्ष आवरण बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किए गए ग्रीन इंडिया मिशन को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी की रिपोर्ट ने तस्वीर चिंताजनक बताई है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2015-16 से 2024-25 के बीच मिशन के तहत वन क्षेत्र के दायरे को 1.4 मिलियन हेक्टेयर बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इसके मुकाबले इस अवधि में केवल 0.03 मिलियन हेक्टेयर की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यानी निर्धारित लक्ष्य का बड़ा हिस्सा पूरा नहीं हो सका और उपलब्धि लक्ष्य से करीब 97.57 प्रतिशत कम रही।
जंगलों की गुणवत्ता सुधारने का लक्ष्य भी पिछड़ा
ग्रीन इंडिया मिशन का उद्देश्य केवल पेड़ लगाकर वन क्षेत्र का विस्तार करना नहीं है। इसके तहत मौजूदा जंगलों और गैर-वन भूमि की पारिस्थितिक गुणवत्ता सुधारने तथा उनसे मिलने वाली पर्यावरणीय सेवाओं को मजबूत करने की भी योजना बनाई गई थी। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक, इसी अवधि में 1.4 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र की गुणवत्ता में सुधार का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन वास्तविक उपलब्धि केवल 0.11 मिलियन हेक्टेयर रही। यह निर्धारित लक्ष्य से लगभग 91.87 प्रतिशत कम है, जिससे मिशन के व्यापक पर्यावरणीय उद्देश्यों की पूर्ति पर सवाल खड़े होते हैं।
2014 में शुरू हुआ था ग्रीन इंडिया मिशन
ग्रीन इंडिया मिशन को वर्ष 2014 में राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना के तहत शुरू किया गया था। इसका मूल उद्देश्य देश में वन और वृक्ष आवरण को बढ़ाने के साथ-साथ मौजूदा जंगलों की गुणवत्ता में सुधार करना और पारिस्थितिकी तंत्र से मिलने वाली सेवाओं को मजबूत करना था। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने, जैव विविधता के संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आजीविका को बेहतर बनाने के लिहाज से भी इस मिशन को महत्वपूर्ण माना गया था।
इस योजना की सफलता का संबंध केवल लगाए गए पौधों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके जीवित रहने, वन पारिस्थितिकी की गुणवत्ता में सुधार और स्थानीय स्तर पर टिकाऊ प्रबंधन से भी जुड़ा है। ऐसे में सीएजी की ओर से सामने रखे गए आंकड़े मिशन के जमीनी क्रियान्वयन की प्रभावशीलता पर महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं।
16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुआ आकलन
सीएजी की रिपोर्ट में ग्रीन इंडिया मिशन के तहत किए गए कार्यों की जांच 16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में की गई। इन क्षेत्रों में पर्यावरण मंत्रालय की ओर से पिछले एक दशक के दौरान निर्धारित भौतिक और वित्तीय लक्ष्यों तथा उनके क्रियान्वयन की समीक्षा की गई। रिपोर्ट में योजना को लागू करने के लिए जरूरी विभिन्न संस्थाओं और योजनाओं के बीच तालमेल की कमी को प्रमुख समस्या के रूप में रेखांकित किया गया है।
सीएजी के अनुसार, मिशन की रणनीति के लिए जरूरी ‘कन्वर्जेंस’ यानी विभिन्न सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के बीच समन्वय सभी संस्थागत स्तरों पर पर्याप्त रूप से दिखाई नहीं दिया। इसका सीधा असर संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल और योजनाओं के जमीनी परिणामों पर पड़ सकता है।
दूसरी सरकारी योजनाओं से तालमेल की कमी बनी बाधा
रिपोर्ट में ग्रीन इंडिया मिशन और पहले से संचालित अन्य योजनाओं के बीच बेहतर तालमेल की कमी को भी महत्वपूर्ण चुनौती बताया गया है। कैंपा, मनरेगा तथा केंद्र और राज्यों की अन्य वृक्षारोपण योजनाओं के साथ मिशन का अपेक्षित समन्वय नहीं हो सका। यदि इन योजनाओं के संसाधनों, श्रम और स्थानीय तंत्र का बेहतर इस्तेमाल किया जाता, तो वन संरक्षण और वृक्षारोपण के प्रयासों का दायरा बढ़ाया जा सकता था।
कन्वर्जेंस की कमी का अर्थ यह भी है कि समान उद्देश्य वाली अलग-अलग सरकारी योजनाएं कई बार समानांतर रूप से काम करती हैं, जबकि उनके बीच साझा योजना और परिणाम आधारित समन्वय सीमित रहता है। सीएजी की टिप्पणियां इसी प्रशासनिक कमजोरी की ओर संकेत करती हैं।
वित्तीय प्रबंधन भी बना बड़ी चुनौती
ग्रीन इंडिया मिशन के अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं होने के पीछे वित्तीय प्रबंधन को भी एक बड़ी बाधा के रूप में चिन्हित किया गया है। रिपोर्ट में योजना के लिए उपलब्ध संसाधनों, उनके उपयोग और वित्तीय प्रबंधन से संबंधित कमियों की ओर ध्यान दिलाया गया है। किसी भी दीर्घकालिक पर्यावरणीय कार्यक्रम में केवल बजट आवंटित करना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि समय पर धन उपलब्ध कराना, उसका प्रभावी उपयोग और परिणामों की लगातार समीक्षा भी जरूरी होती है।
वन संरक्षण और पारिस्थितिकी सुधार जैसी परियोजनाओं के परिणाम तत्काल दिखाई नहीं देते। ऐसे में वित्तीय संसाधनों की निरंतरता और योजनाबद्ध खर्च विशेष महत्व रखता है। सीएजी की रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि इन पहलुओं में सुधार की पर्याप्त गुंजाइश बनी हुई है।
निगरानी व्यवस्था और पारदर्शिता पर भी सवाल
रिपोर्ट में ग्रीन इंडिया मिशन के तहत किए गए कार्यों की निगरानी को लेकर भी कमियां सामने आई हैं। सीएजी के अनुसार, कई स्तरों पर योजनाओं की प्रगति और परिणामों की प्रभावी निगरानी पर्याप्त नहीं रही। विशेष रूप से पारदर्शिता से जुड़े प्रावधानों के पालन में भी कमी पाई गई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 14 राज्यों ने सार्वजनिक जानकारी के लिए जरूरी वेब-लिंक उपलब्ध नहीं कराए। इससे आम नागरिकों और संबंधित पक्षों के लिए यह जानना कठिन हो सकता है कि मिशन के तहत किस क्षेत्र में कितना काम हुआ, कितनी राशि खर्च हुई और निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले वास्तविक प्रगति कितनी रही।
पर्यावरणीय लक्ष्यों के लिए अब क्रियान्वयन पर जोर जरूरी
सीएजी की रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब जलवायु परिवर्तन, वन संरक्षण और जैव विविधता को लेकर भारत के सामने चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। वन क्षेत्र में वृद्धि केवल पर्यावरणीय लक्ष्य नहीं है, बल्कि जल संरक्षण, मिट्टी की गुणवत्ता, जैव विविधता, कार्बन अवशोषण और स्थानीय समुदायों की आजीविका से भी इसका सीधा संबंध है।
ऐसे में ग्रीन इंडिया मिशन के आंकड़े केवल एक सरकारी योजना की उपलब्धि और कमी का मामला नहीं हैं। वे यह सवाल भी उठाते हैं कि देश के बड़े पर्यावरणीय लक्ष्यों को जमीन पर उतारने के लिए योजनाओं के बीच कितना बेहतर समन्वय, मजबूत वित्तीय व्यवस्था, पारदर्शी निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित की जा रही है। आने वाले वर्षों में मिशन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन संस्थागत कमियों को किस हद तक दूर किया जाता है और वृक्षारोपण से आगे बढ़कर वास्तविक वन गुणवत्ता और पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण पर कितना जोर दिया जाता है।