ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित विशाल विकास परियोजना के बीच गलाथिया खाड़ी के समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को लेकर नया विवाद सामने आया है। पर्यावरण मंत्रालय के अधीन काम करने वाले भारतीय प्राणी सर्वेक्षण और राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र के दस्तावेजों में गलाथिया खाड़ी में प्रवालों की स्थिति को लेकर अलग-अलग तस्वीर सामने आती है। यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी क्षेत्र में एक बड़ा पोत स्थानांतरण बंदरगाह प्रस्तावित है। पर्यावरणीय मंजूरी और उससे जुड़ी शर्तों के बीच अब प्रवालों के स्थानांतरण की तैयारी भी सामने आ चुकी है। फरवरी 2026 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने भी इस मुद्दे पर उपलब्ध वैज्ञानिक सामग्री और सरकारी पक्षों पर विचार किया था।
एक ही मंत्रालय के 2 संस्थानों की अलग-अलग तस्वीर
विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारतीय प्राणी सर्वेक्षण और राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र के निष्कर्षों में दिखाई देता है। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की ओर से परियोजना के प्रत्यक्ष कार्य क्षेत्र में किसी बड़े प्रवाल भित्ति तंत्र की मौजूदगी से इनकार किया गया है, हालांकि उसके दस्तावेजों में आसपास के क्षेत्रों में प्रवालों की मौजूदगी दर्ज है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र की द्वीप तटीय विनियमन क्षेत्र योजना में ग्रेट निकोबार में विकसित तटीय प्रवाल भित्तियों का उल्लेख मिलता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष रखे गए दस्तावेजों में भी इस विरोधाभास को लेकर विस्तृत बहस हुई है।
मानचित्रों में प्रवालों की मौजूदगी का सवाल
विवाद केवल वैज्ञानिक निष्कर्षों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन मानचित्रों तक भी पहुंचता है जिनके आधार पर तटीय क्षेत्रों की पर्यावरणीय संवेदनशीलता तय की जाती है। राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र की 2023 की द्वीप तटीय विनियमन क्षेत्र योजना से संबंधित दस्तावेजों में ग्रेट निकोबार में प्रवाल भित्तियों के व्यापक रूप से विकसित होने का उल्लेख किया गया है। कुछ दस्तावेजों में गलाथिया क्षेत्र के आसपास प्रवालों की मौजूदगी का भी उल्लेख है। यही वजह है कि पर्यावरणीय कार्यकर्ताओं और परियोजना के आलोचकों ने मानचित्रण और मंजूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं। हालांकि प्रवालों को जानबूझकर मानचित्रों से हटाकर परियोजना को मंजूरी दिलाने का आरोप अभी विवाद का विषय है और इसे स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
फिर क्यों शुरू हुई प्रवालों को दूसरी जगह ले जाने की तैयारी
मामले का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि एक ओर परियोजना क्षेत्र में बड़े प्रवाल भित्ति तंत्र की अनुपस्थिति का सरकारी पक्ष सामने आया, वहीं दूसरी ओर परियोजना से प्रभावित होने वाले प्रवालों को दूसरी जगह स्थानांतरित करने की तैयारी चल रही है। जून 2026 में सामने आई जानकारी के अनुसार भारतीय प्राणी सर्वेक्षण ने ग्रेट निकोबार के पश्चिमी तट पर 4 नए स्थानों की पहचान की है, जहां गलाथिया खाड़ी से प्रवाल बस्तियों और विशाल सीपों को स्थानांतरित किया जाना प्रस्तावित है। यह कार्रवाई पर्यावरणीय और तटीय विनियमन संबंधी मंजूरी की शर्तों के अनुरूप परियोजना का हिस्सा बताई गई है।
16000 से अधिक प्रवाल बस्तियों पर निगरानी
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के अधिकारियों के अनुसार गलाथिया खाड़ी के प्रस्तावित बंदरगाह क्षेत्र से प्रभावित होने वाली 16000 से अधिक प्रवाल बस्तियों को स्थानांतरित करने की योजना पर काम हो रहा है। संस्थान ने संभावित स्थानांतरण स्थलों पर तलछट जमा होने की स्थिति का अध्ययन भी शुरू किया है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि नए स्थानों पर प्रवालों के जीवित रहने के लिए परिस्थितियां कितनी अनुकूल हैं। प्रस्तावित प्रक्रिया के तहत स्थानांतरित की जाने वाली प्रवाल बस्तियों का व्यवस्थित अभिलेख तैयार करने और प्रत्येक बस्ती की स्थिति पर निगरानी रखने की योजना भी बताई गई है।
प्रवाल स्थानांतरण कितना कठिन है
प्रवालों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना केवल उन्हें समुद्र से निकालकर किसी दूसरे क्षेत्र में रखने का काम नहीं है। प्रवाल समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनके साथ रहने वाले अनेक जीवों तथा स्थानीय पर्यावरणीय परिस्थितियों का संतुलन भी जुड़ा होता है। विशेषज्ञों ने पूरे प्रवाल समूहों को सुरक्षित रूप से स्थानांतरित करने की व्यवहारिक कठिनाइयों पर सवाल उठाए हैं। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की योजना में भी नए स्थानों पर तलछट, समुद्री परिस्थितियों और प्रवालों के जीवित रहने की निगरानी को महत्वपूर्ण माना गया है। इसलिए वास्तविक सफलता केवल स्थानांतरण पूरा होने से नहीं, बल्कि लंबे समय तक प्रवालों के जीवित और स्वस्थ रहने से तय होगी।
ग्रेट निकोबार के समुद्री जीवन का व्यापक महत्व
ग्रेट निकोबार केवल प्रस्तावित बंदरगाह के कारण महत्वपूर्ण नहीं है। द्वीप की जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है और गलाथिया खाड़ी चमड़े की पीठ वाले समुद्री कछुओं के महत्वपूर्ण प्रजनन स्थलों में शामिल है। राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र के द्वीप संबंधी आंकड़ों में भी ग्रेट निकोबार को उच्च जैव विविधता वाले क्षेत्र के रूप में दर्ज किया गया है। समुद्री क्षेत्र में प्रवालों के अलावा अन्य जीव-जंतु और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र भी परियोजना से प्रभावित हो सकते हैं। यही कारण है कि विकास परियोजना और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन का सवाल इस पूरे विवाद के केंद्र में है।
मंजूरी के बाद भी खत्म नहीं हुआ पर्यावरणीय सवाल
फरवरी 2026 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने ग्रेट निकोबार परियोजना से जुड़ी पर्यावरणीय मंजूरी में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया। प्रवालों के मामले में अधिकरण ने सरकारी पक्ष, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की रिपोर्ट और अन्य उपलब्ध सामग्री पर विचार किया। साथ ही यह भी दर्ज हुआ कि भारतीय प्राणी सर्वेक्षण ने परियोजना क्षेत्र से जुड़े आसपास के हिस्सों में प्रवालों की मौजूदगी स्वीकार की थी और संभावित नुकसान से बचने के लिए प्रवालों को स्थानांतरित करने की सिफारिश की थी। इसका अर्थ यह है कि कानूनी मंजूरी मिल जाने के बावजूद प्रवाल संरक्षण और स्थानांतरण की निगरानी अब भी परियोजना के पर्यावरणीय प्रबंधन का अहम हिस्सा बनी हुई है।
असली कसौटी होगी पारदर्शिता और दीर्घकालीन निगरानी
ग्रेट निकोबार में प्रवालों को लेकर उठा विवाद केवल यह तय करने का सवाल नहीं है कि किसी एक स्थान पर प्रवाल भित्ति है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययनों और मानचित्रों में सामने आए अंतर को किस तरह स्पष्ट किया जाता है और परियोजना से प्रभावित समुद्री जैव विविधता की निगरानी कितनी पारदर्शी ढंग से होती है। यदि प्रवालों को स्थानांतरित किया जाता है तो उनकी संख्या दर्ज करने, नए स्थानों की उपयुक्तता जांचने और लंबे समय तक उनके जीवित रहने का स्वतंत्र वैज्ञानिक आकलन महत्वपूर्ण होगा। ग्रेट निकोबार जैसी जैव विविधता संपन्न जगह पर विकास की सफलता केवल निर्माण की गति से नहीं, बल्कि प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के परिणाम से भी तय होगी।