डेंगू और अन्य मच्छरजनित बीमारियों से निपटने के लिए अब तक दुनिया भर में कीटनाशकों, फॉगिंग, रासायनिक दवाओं और जनजागरूकता अभियानों पर सबसे अधिक भरोसा किया जाता रहा है। लेकिन जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और कीटनाशकों के प्रति बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता के कारण इन पारंपरिक उपायों की प्रभावशीलता कई क्षेत्रों में सीमित होती जा रही है। इसी चुनौती को देखते हुए तकनीकी और जैविक अनुसंधान के संयोजन पर आधारित नई रणनीतियां विकसित की जा रही हैं। इसी दिशा में गूगल की अनुसंधान परियोजना ‘डिबग’ के अंतर्गत ऐसी तकनीक पर काम किया जा रहा है जिसका उद्देश्य मच्छरों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि डेंगू फैलाने वाली विशेष प्रजाति की आबादी को प्राकृतिक तरीके से धीरे-धीरे कम करना है। यदि यह प्रयोग व्यापक स्तर पर सफल होता है तो भविष्य में मच्छरजनित रोग नियंत्रण के क्षेत्र में इसे महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है।
क्या है ‘डिबग’ परियोजना और कैसे तैयार किए जा रहे विशेष नर मच्छर
गूगल की अनुसंधान पहल ‘डिबग’ के अंतर्गत अमेरिका के फ्लोरिडा और कैलिफोर्निया जैसे क्षेत्रों में लगभग 1.6 करोड़ विशेष नर मच्छरों को छोड़ने की योजना बनाई गई है। इन मच्छरों को प्रयोगशालाओं में एक विशेष जीवाणु से संक्रमित किया जाता है, जिससे उनकी जैविक प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है। यह तकनीक आनुवंशिक परिवर्तन पर आधारित नहीं है, बल्कि प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले जीवाणु का नियंत्रित उपयोग करती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रक्रिया के माध्यम से पर्यावरण में रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग को भी कम किया जा सकता है। परियोजना का उद्देश्य केवल रोग फैलाने वाली आबादी को नियंत्रित करना है, न कि सभी प्रकार के मच्छरों का पूर्ण उन्मूलन करना।
मादा मच्छर के जीवन चक्र का उठाया जा रहा है वैज्ञानिक लाभ
इस तकनीक का आधार मच्छरों के प्राकृतिक प्रजनन व्यवहार को समझने पर टिका हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार मादा मच्छर अपने जीवनकाल में सामान्यतः केवल एक बार ही सफल प्रजनन के लिए साथी चुनती है। यदि उसका संयोग ऐसे नर मच्छर से होता है जिसकी प्रजनन क्षमता विशेष जीवाणु के प्रभाव से निष्क्रिय हो चुकी हो, तो उसके द्वारा दिए गए अंडों से नई संतति विकसित नहीं हो पाती। परिणामस्वरूप अगली पीढ़ी में उस विशेष प्रजाति की संख्या धीरे-धीरे घटने लगती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल मादा मच्छर ही मनुष्यों का रक्त चूसती है और डेंगू, जीका, चिकनगुनिया तथा येलो फीवर जैसे रोगों के वायरस का प्रसार करती है, जबकि नर मच्छर मनुष्यों को नहीं काटते। इसलिए इस तकनीक से मानव स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष जोखिम बहुत कम माना जाता है।
निशाने पर केवल ‘एडीज़ एजिप्टी’, पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नहीं होगा नुकसान
इस परियोजना का उद्देश्य सभी मच्छरों को समाप्त करना नहीं है, बल्कि केवल ‘एडीज़ एजिप्टी’ नामक उस विशेष प्रजाति को नियंत्रित करना है जो डेंगू, जीका वायरस, चिकनगुनिया और येलो फीवर जैसी गंभीर बीमारियों के प्रसार के लिए जिम्मेदार मानी जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अमेरिका के फ्लोरिडा जैसे क्षेत्रों में यह मच्छर मूल निवासी प्रजाति नहीं है, बल्कि बाहरी क्षेत्रों से वहां पहुंचा है। इसलिए इसकी आबादी कम होने से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर व्यापक नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना अपेक्षाकृत कम मानी जा रही है। इसके बावजूद पर्यावरण विशेषज्ञ इस परियोजना के दीर्घकालिक प्रभावों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करने की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं ताकि किसी भी अनपेक्षित पारिस्थितिक असंतुलन से बचा जा सके।
मंजूरी और तकनीकी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं
हालांकि इस महत्वाकांक्षी योजना को अभी अंतिम प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई है। परियोजना के लिए अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी से अनुमति मांगी गई है और संबंधित वैज्ञानिक मूल्यांकन की प्रक्रिया जारी है। इसके साथ ही एक बड़ी तकनीकी चुनौती यह भी है कि प्रयोगशाला में तैयार किए गए करोड़ों मच्छरों में नर और मादा की सटीक एवं तीव्र पहचान सुनिश्चित की जाए। यदि गलती से बड़ी संख्या में मादा मच्छर छोड़े गए तो परियोजना के उद्देश्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसी कारण शोधकर्ता अत्याधुनिक स्वचालित पहचान प्रणालियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों के माध्यम से नर और मादा मच्छरों को अधिक सटीकता से अलग करने की दिशा में भी कार्य कर रहे हैं।
पहले भी मिल चुके हैं सकारात्मक परिणाम, लेकिन बहस अभी जारी है
विश्व के अनेक देशों में ‘वर्ल्ड मॉस्किटो प्रोग्राम’ द्वारा वोलबैकिया जीवाणु आधारित तकनीक का उपयोग पहले भी किया जा चुका है। विभिन्न परीक्षण क्षेत्रों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार जहां इस तकनीक का व्यवस्थित उपयोग किया गया, वहां डेंगू के मामलों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। हालांकि इस प्रकार के प्रयोगों को लेकर वैज्ञानिक समुदाय और पर्यावरण विशेषज्ञों के बीच बहस भी जारी है। कुछ विशेषज्ञ इसे प्रकृति के संतुलन में मानवीय हस्तक्षेप मानते हैं, जबकि अन्य का तर्क है कि यदि नियंत्रित और वैज्ञानिक तरीके से ऐसी तकनीकों का उपयोग लाखों लोगों के जीवन की रक्षा कर सकता है, तो इन्हें गंभीरता से अपनाने पर विचार किया जाना चाहिए। भविष्य में इस प्रकार की जैविक नियंत्रण तकनीकें पारंपरिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने और वैश्विक स्तर पर डेंगू नियंत्रण की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं।