कुत्तों की सूंघने की क्षमता इंसानों की तुलना में बेहद विकसित होती है और इसी कारण वर्षों से उनका इस्तेमाल खोज एवं सुरक्षा अभियानों में किया जाता रहा है। वैज्ञानिकों ने इसी क्षमता को चिकित्सकीय अनुसंधान से जोड़कर यह समझने की कोशिश की है कि क्या कुत्ते शरीर में होने वाले ऐसे रासायनिक बदलावों को पहचान सकते हैं, जो कैंसर जैसी बीमारी से जुड़े हों। कुछ शोधों में प्रशिक्षित कुत्तों ने कैंसर से जुड़े नमूनों और सामान्य नमूनों के बीच अंतर करने की क्षमता दिखाई है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि कुत्ता किसी व्यक्ति को देखकर या सूंघकर निश्चित रूप से कैंसर का निदान कर सकता है।
बीमारी बदल देती है शरीर की रासायनिक पहचान
मानव शरीर में लगातार जैविक और रासायनिक प्रक्रियाएं चलती रहती हैं, जिनसे कई प्रकार के वाष्पशील कार्बनिक यौगिक यानी VOCs बनते हैं। ये यौगिक सांस, पसीने, मूत्र और शरीर से निकलने वाले अन्य द्रवों के माध्यम से बाहर आ सकते हैं। कैंसर जैसी बीमारी शरीर की सामान्य जैविक प्रक्रियाओं में बदलाव ला सकती है, जिसके परिणामस्वरूप इन यौगिकों की मात्रा या संरचना भी बदल सकती है। वैज्ञानिकों की रुचि इसी संभावित रासायनिक संकेत में है, क्योंकि यदि बीमारी से जुड़े विशिष्ट पैटर्न को विश्वसनीय तरीके से पहचाना जा सके तो भविष्य में यह शुरुआती जांच के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
कॉटन मास्क से शुरू होती है जांच प्रक्रिया
भारत में विकसित की जा रही इस शोध तकनीक में प्रक्रिया का शुरुआती चरण अपेक्षाकृत सरल रखा गया है। व्यक्ति को करीब 10 मिनट तक कॉटन मास्क पहनकर सामान्य बातचीत करने और गहरी सांस लेने के लिए कहा जाता है। इस दौरान सांस से निकलने वाले विभिन्न यौगिक मास्क में एकत्र हो जाते हैं। इसके बाद नमूने को प्रयोगशाला में भेजा जाता है, जहां विशेष रूप से प्रशिक्षित कुत्तों को इन नमूनों को सूंघने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उद्देश्य यह समझना है कि क्या कुत्ते कैंसर से जुड़े रासायनिक संकेतों और सामान्य नमूनों के बीच लगातार और विश्वसनीय अंतर कर सकते हैं।
कुत्तों की प्रतिक्रिया को भी तकनीक में शामिल किया गया
इस शोध की खासियत केवल कुत्तों की सूंघने की क्षमता तक सीमित नहीं है। परीक्षण के दौरान कुत्तों को विशेष उपकरण पहनाए जाते हैं, जिनकी मदद से उनके व्यवहार और शरीर से जुड़े कई संकेत दर्ज किए जाते हैं। इनमें मस्तिष्क की गतिविधि, हृदय गति, सांस लेने की गति और शारीरिक हावभाव जैसे संकेत शामिल हो सकते हैं। इसके बाद इन आंकड़ों का विश्लेषण AI आधारित मॉडल के माध्यम से किया जाता है। यह प्रणाली विभिन्न संकेतों को मिलाकर VOC जोखिम स्कोर तैयार करती है, जिससे कुत्ते की प्रतिक्रिया को अधिक व्यवस्थित और मापने योग्य वैज्ञानिक आंकड़े में बदलने की कोशिश की जाती है।
3000 से ज्यादा लोगों पर हुआ अध्ययन
इस तकनीक की संभावनाओं को परखने के लिए कर्नाटक के 6 अस्पतालों में 3000 से अधिक लोगों को शामिल कर अध्ययन किया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अंतिम परीक्षण समूह में 283 ऐसे मरीज थे, जिनमें बायोप्सी के माध्यम से पहले ही कैंसर की पुष्टि हो चुकी थी। अप्रैल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, इस प्रणाली ने कैंसर वाले लगभग 10 में से 9 मामलों की सही पहचान की। वहीं कैंसर नहीं होने वाले लोगों में भी लगभग 10 में से 9 मामलों को सही ढंग से पहचानने का दावा किया गया। ये आंकड़े तकनीक की संभावित उपयोगिता की ओर संकेत करते हैं, लेकिन इन्हें नियमित चिकित्सकीय निदान के बराबर नहीं माना जा सकता।
सभी चरणों में प्रदर्शन ने बढ़ाई उम्मीद
शोध में सामने आई एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि तकनीक का प्रदर्शन कैंसर के अलग-अलग चरणों में अपेक्षाकृत समान बताया गया। यदि आगे के बड़े और स्वतंत्र अध्ययनों में भी ऐसे परिणाम दोहराए जाते हैं, तो यह प्रणाली कैंसर की जांच के क्षेत्र में एक सहायक उपकरण के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। खासतौर पर ऐसी तकनीक जो अपेक्षाकृत सरल नमूने से प्रारंभिक जोखिम का संकेत दे सके, वह बड़े पैमाने पर जांच कार्यक्रमों के लिए उपयोगी हो सकती है। फिर भी इसकी वास्तविक चिकित्सकीय उपयोगिता निर्धारित करने के लिए व्यापक सत्यापन जरूरी होगा।
अभी डॉक्टर की जांच का विकल्प नहीं
कुत्तों और AI पर आधारित यह तकनीक फिलहाल शोध के चरण में है और इसे कैंसर का अंतिम चिकित्सकीय निदान मानना सही नहीं होगा। किसी व्यक्ति में कैंसर की पुष्टि के लिए चिकित्सकीय जांच, इमेजिंग, प्रयोगशाला परीक्षण और जरूरत पड़ने पर बायोप्सी जैसी स्थापित प्रक्रियाएं अभी भी महत्वपूर्ण हैं। भविष्य में यदि इस प्रणाली की सटीकता, विश्वसनीयता और दोहराव बड़े अध्ययनों में प्रमाणित होते हैं, तो यह डॉक्टरों को जोखिम वाले मामलों की पहचान करने में सहायता कर सकती है। फिलहाल इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि जीवविज्ञान, प्रशिक्षित कुत्तों की घ्राण क्षमता और AI को जोड़कर कैंसर पहचान की एक नई दिशा पर वैज्ञानिक काम आगे बढ़ रहा है।
भारत में चिकित्सा अनुसंधान के लिए नई संभावना
कैंसर का समय रहते पता लगाना उपचार की संभावनाओं और रोगी के परिणामों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में शरीर से निकलने वाले रासायनिक संकेतों को पहचानने वाली तकनीकों पर दुनिया भर में अनुसंधान हो रहा है। भारत में कुत्तों और AI को जोड़कर किया जा रहा यह प्रयास इसी व्यापक वैज्ञानिक खोज का हिस्सा है। यदि भविष्य के परीक्षण इसकी प्रभावशीलता की पुष्टि करते हैं, तो यह पारंपरिक जांच पद्धतियों का विकल्प नहीं, बल्कि उनके साथ काम करने वाला कम आक्रामक प्रारंभिक जोखिम-जांच उपकरण बन सकता है। फिलहाल इसे आशाजनक शोध जरूर कहा जा सकता है, लेकिन नियमित चिकित्सा में इस्तेमाल से पहले वैज्ञानिक प्रमाणों की कई और कसौटियां पार करनी होंगी।