आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में एंटीबायोटिक दवाओं ने लाखों लोगों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन इनका अनियंत्रित और अनावश्यक उपयोग अब वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका द लैंसेट पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित एक नए अध्ययन में सामने आया है कि अधिकांश देशों में ऐसी एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जिन्हें केवल सीमित और विशेष परिस्थितियों में ही दिया जाना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो बैक्टीरिया इन दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेंगे, जिससे भविष्य में सामान्य संक्रमणों का उपचार भी जटिल हो सकता है। यह संकट केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत सहित लगभग पूरी दुनिया इसके दायरे में आती दिखाई दे रही है।
डब्ल्यूएचओ ने दवाओं को तीन श्रेणियों में क्यों बांटा
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एंटीबायोटिक दवाओं के सुरक्षित और संतुलित उपयोग के लिए इन्हें तीन प्रमुख श्रेणियों—‘एक्सेस’, ‘वॉच’ और ‘रिजर्व’—में वर्गीकृत किया है। ‘एक्सेस’ श्रेणी की दवाएं सामान्य संक्रमणों के उपचार के लिए पहली पसंद मानी जाती हैं, जबकि ‘वॉच’ श्रेणी की दवाओं का उपयोग केवल तब किया जाना चाहिए जब सामान्य दवाएं प्रभावी न रहें। सबसे अंतिम विकल्प ‘रिजर्व’ श्रेणी की दवाएं होती हैं, जिनका उपयोग केवल अत्यंत गंभीर और दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों में किया जाता है। इस वर्गीकरण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाओं का अनावश्यक उपयोग न हो और भविष्य के लिए उनकी प्रभावशीलता सुरक्षित बनी रहे।
अध्ययन में सामने आई चिंताजनक तस्वीर
शोधकर्ताओं ने विभिन्न देशों के वास्तविक एंटीबायोटिक उपयोग के आंकड़ों का विश्लेषण कर पाया कि अधिकांश देशों में ‘वॉच’ श्रेणी की दवाओं का उपयोग अनुमान से कहीं अधिक हो रहा है। अध्ययन में शामिल 67 देशों में लगभग 72 प्रतिशत देशों ने आवश्यकता से अधिक एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग किया, जबकि लगभग 99 प्रतिशत देशों में ‘वॉच’ श्रेणी की दवाओं का इस्तेमाल तय मानकों से अधिक पाया गया। इसके साथ ही आधे से अधिक देशों में ‘रिजर्व’ श्रेणी की दवाओं का पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा है, जिससे गंभीर संक्रमणों से जूझ रहे मरीजों के उपचार पर भी प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। यह स्थिति वैश्विक स्वास्थ्य तंत्र के लिए चिंता का विषय मानी जा रही है।
भारत सहित विकासशील देशों के सामने दोहरी चुनौती
भारत जैसे देशों में एंटीबायोटिक दवाओं की आसान उपलब्धता, बिना चिकित्सकीय परामर्श के दवा लेने की प्रवृत्ति, अधूरा उपचार और स्वयं दवा चुनने की आदत इस समस्या को और गंभीर बना रही है। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर महानगरों तक कई लोग सामान्य सर्दी, खांसी या वायरल संक्रमण में भी एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन कर लेते हैं, जबकि ऐसे मामलों में इन दवाओं की आवश्यकता नहीं होती। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दवाओं का विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में संक्रमणों का इलाज महंगा, लंबा और अधिक जटिल हो सकता है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर आर्थिक बोझ भी बढ़ेगा और मृत्यु दर में वृद्धि की आशंका भी बनी रहेगी।
संयुक्त राष्ट्र का लक्ष्य और वैश्विक जिम्मेदारी
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2024 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की ‘एक्सेस- वॉच- रिजर्व’ प्रणाली को वैश्विक स्तर पर एंटीबायोटिक उपयोग की निगरानी का आधार बनाने पर सहमति व्यक्त की थी। इसके तहत वर्ष 2030 तक यह लक्ष्य निर्धारित किया गया है कि दुनिया में उपयोग होने वाली कम से कम 70 प्रतिशत एंटीबायोटिक दवाएं ‘एक्सेस’ श्रेणी की हों। इस लक्ष्य का उद्देश्य अधिक शक्तिशाली दवाओं के अनावश्यक उपयोग को रोकना और एंटीबायोटिक प्रतिरोध की बढ़ती चुनौती पर नियंत्रण पाना है। हालांकि हालिया अध्ययन यह संकेत देता है कि अधिकांश देशों को इस दिशा में अभी लंबा सफर तय करना बाकी है।
जागरूकता, नीति और जिम्मेदार उपयोग ही समाधान
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि एंटीबायोटिक प्रतिरोध से निपटने के लिए केवल सरकारी नीतियां पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि चिकित्सकों, दवा विक्रेताओं और आम नागरिकों की समान भागीदारी भी आवश्यक है। बिना चिकित्सकीय सलाह के एंटीबायोटिक का सेवन बंद करना, पूरा उपचार निर्धारित अवधि तक लेना, अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण के मानकों का पालन करना और दवा उपयोग की निगरानी को मजबूत बनाना इस दिशा में सबसे प्रभावी कदम माने जाते हैं। यदि समय रहते इन उपायों को गंभीरता से लागू नहीं किया गया तो भविष्य में सामान्य संक्रमण भी जानलेवा साबित हो सकते हैं और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक एंटीबायोटिक उपचार अपनी प्रभावशीलता खो सकता है।